सब्सक्राइब करें 

बॉक्‍स में अपना ईमेल डालें।

twit.jpg
23-09-2014

बाबा रामदेव के आंदोलन से उठे प्रश्न!

आदरणीय राष्ट्रप्रेमी भाइयों और बहनों

आज के पत्र में मैंने पिछले एक साल से उठ रहे कई प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया है।

समाज में और संसार में अलग-अलग समय में अलग-अलग महापुरुषों ने कुछ बड़े परिवर्तन किये हैं और हम अपने भारतीय अध्यात्मिक महापुरुषों को अपना आदर्श मानते हैं, अध्यात्मिक जीवन में, सामाजिक जीवन में और राजनैतिक जीवन में।विदेशी लोगों के जब उदहारण दिए जाते हैं तो वो हमारे आदर्श नहीं हैं बल्कि उनकी बाते आंशिक रूप से ही होते हैं अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए। और वो महापुरुष किसी भी धरती पर हुए या उन्होंने किसी भी क्षेत्र में कोई आदर्श कार्य किया या हम उन्हें आदर्श ना भी माने तो भी आंशिक रूप से हम उनका उदहारण तो दे ही सकते हैं।अंग्रेज हमारे आदर्श नहीं हो सकते लेकिन इनसे भी हम कुछ सीख सकते हैं। क्योंकि हमारे ऋषियों ने कहा है कि पशुओं से भी सीखना चाहिए और शायद इसीलिए "श्वान निद्रा,बको ध्यानम" वाली पंक्ति की उत्पत्ति हुई होगी।हमारे योग में आप देखेंगे कि कई आसन हैं जो जानवरों के शारीरिक क्रियाओं से लिए गए हैं, जैसे मत्ष्य आसन, मंडूक आसन, भुजंगासन, आदि, आदि।

विश्व के महापुरुषों का जब आप अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि उन्होंने जब अपना काम शुरू किया था तो उन्हें कई कठिनाइयों के साथ-साथ लोगों के असहयोग का भी सामना पड़ा था।चाहे वो ईसा मसीह हों, मोहम्मद साहब हो, सिकंदर हो, गौतम बुद्ध हों, या और भी कई नाम हैं।लेकिन उन सब कठिनाइयों से निकल कर उन्होंने अपने को विश्व के सामने सिद्ध किया था।वैसे ही परम पूज्य स्वामी रामदेव जी हैं, आज इनके समर्थकों के साथ-साथ आलोचकों की संख्या भी कम नहीं है, आलोचकों में मुख्य रूप से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोग, जे.एन.यू और दिल्ली विश्वविद्यालय के लोग ही हैं जो अपने को बुद्धिजीवी कहते नहीं थकते। मैं यहाँ पर अभी कुछ दिन पहले गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की बात को जरूर जोड़ना चाहूँगा।

जैन मुनि तरुण सागर जी के एक पुरस्कार समारोह में, जहाँ स्वामी रामदेव जी को पुरस्कार दिया गया था, भाषण देते हुए मोदी जी बोले, "एक जमाना था जब इस देश के संतों, महंतो और भगवंतों की आलोचना होती थी, आलोचना इस बात को लेकर होती थी कि हमारे संत और महंत कुछ करते नहीं हैं, अपने मठ-मंदिरों में बैठे रहते हैं,मौज से खाना खाते हैं, भक्तों से पूजा-अर्चना करवाते हैं, ये आलोचना आपने सुनी होगी।इतना ही नहीं ये भी आलोचना होती थी कि देखिये क्रिशचन मिशनरी वाले कितना काम करते हैं, ईसाईयों के धर्मगुरु कितना काम करते हैं, ऐसी तुलना भी होती है।और आज कोई संत, समाज की पीड़ा से पीड़ित है, दुखी है और वो किसी विषय को लेकर बात करते हैं, और अपना कर्त्तव्य मान कर राष्ट्र की जनचेतना जगाने का काम करते हैं तो मेरे देश का दुर्भाग्य देखिये कि कल तक जो लोग संतों से सवाल करते थे कि "क्यों नहीं कुछ कर रहे हो" आज उनको गाली दे रहे हैं और कह रहे हैं कि "ये सब क्यों कर रहे हो"।मित्रों इससे बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं हो सकता।हमारा इतिहास गवाह है, हमारी संस्कृति गवाह है, हमारी परंपरा गवाह है कि जब-जब मानव समाज संकट में आया है तब-तब संतों ने ही हमारा मार्गदर्शन किया है।"

इस बार के आन्दोलन के पहले दिन जब बाबा रामदेव जी ने पहला भाषण दिया तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया में ये खबर चलने लगी कि "बाबा इस बार नरम पड़े", "बाबा मैच्योर हो गए", आदि, आदि।एक अफवाह अपने मित्र आचार्य बालकृष्ण जी को छुड़ाने की सौदेबाजी को लेकर भी उड़ायी गयी, लेकिन यह चीज कहीं सामने नहीं आयी।अंतिम दिन आते-आते उन्होंने कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ का नारा दे दिया, तब इलक्ट्रोनिक मीडिया उनको "बगावती" कहने लगा।13 तारीख को स्वामीजी के आवाहन पर कई दलों के नेता मंच पर आये और उनमे महत्वपूर्ण था भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी जी का मंच पर आना, स्वामीजी के मंच पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आ गए इसलिए सबको (मीडिया वालों को) तकलीफ हो रही है।

आप देखिएगा कि बाकी दलों के खिलाफ कोई कुछ नहीं बोल रहा, अगर उस मंच पर कांग्रेस के लोग आ जाते तो ? न्यौता तो स्वामीजी ने उनको भी दिया था और तीन दिन तक उनका इंतजार करते रहे, एक पूरा दिन उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के लिए भी निर्धारित किया था।लेकिन तकलीफ उनको भाजपा को लेकर है, और ये विचारधाराएँ निकलती है जे.एन.यु. और दिल्ली विश्वविद्यालय की गलियों से क्योंकि ये दोनों जगह वामपंथी विचारधाराओं के केन्द्र हैं, और ध्यान दीजियेगा टेलीविजन चैनलों पर चर्चा-परिचर्चा में इन्ही संस्थाओं के लोग ज्यादा होते हैं । और हर चर्चा-परिचर्चा में ये मुद्दों को भुला कर कुछ और विषय पर चर्चा करने लगते हैं। वैसे लोगों को इस चर्चा में लाया जाता है जिन्होंने स्वामी रामदेव जी को ना सुना है और ना उनके इस विषय पर दिए गए व्याख्यानों को सुना, पढ़ा या समझा ही है, बार-बार वो अजीब प्रश्न करते हैं।

अनशनकारियों की मांगों को कोई भी तंत्र और दल मानने को तैयार नहीं हैं, सब अपने को और संसद को सर्वोच्च मान रहे हैं, हाला कि स्वामी रामदेव जी भी तो नेताओं से, सत्तारूढ़ दल से और सांसदों से ही इस काम को करने के लिए कह रहे हैं।अगर वो खुद कर लेते तो फिर इस अनशन और आन्दोलन की आवश्यकता क्या थी ? चूकी ये काम सरकार और सिर्फ सरकार ही कर सकती है या सरकार के द्वारा ही सम्पादित किया जा सकता है इसलिए उनसे ये निवेदन किया जाता रहा है।

मंच पर दूसरे दलों के नेता आये तो मीडिया वाले कह सकते हैं कि ये उनकी मजबूरी थी या समय की मांग थी या मौके का फायदा उठाने के लिए वो आये थे, क्यों कि जो काम वो नहीं कर पाए वो एक सन्यासी ने कर दिखाया, यानि जनता को जागरूक कर दिया और वो भी एक नहीं कई मुद्दों पर।स्वामी रामदेव जी ने अन्य दलों वालों को बुलाया और वो आये, उन्होंने दुसरे दल वालों को क्यों बुलाया ? आपने कभी गन्ने का खेत देखा है, गन्ने के खेतों में जब गन्ने की कटाई होती है तो उसके गट्ठर को बांधने के लिए रस्सी नहीं प्रयोग में लायी जाती हैं बल्कि गन्ने के पत्तों को ही रस्सी का स्वरुप देकर उन्हें बांधा जाता है।मतलब समझ गए ना आप?

जैसे लोहे को लोहा काटता है ठीक वैसे ही इतिहास के इस दौर में राजनीति से ही सबसे बड़े बदलाव आयेंगे इस बात को नहीं भूलना चाहिए हमें, इसलिए इसमें चोर भी आयेंगे।उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय रामदेव जी ने लोगों से जाकर कहा था कि "दामन में तो सबके दाग हैं, लेकिन जो कम दाग वाला हो उसको वोट दें"।कुछ नेता अभी मंच पर आये हैं, बदलाव लाने के लिए इसमें आपको, हमको, साधू-संतों और समाज सेवियों को बड़ी संख्या में शामिल होना होगा ताकि चाभी हमारे यानि जनता के हाथ में ही रहे और हम भारतीय राजनीति को एक दिशा प्रदान कर सके।

बार-बार कहा जाता है कि संसद और सांसद सर्वोच्च है। संसद और सांसद, ये दोनों अलग हस्तियां हैं।संसद एक संप्रभुतासंपन्न संस्थागत इकाई है, लेकिन यह संवैधानिक हैसियत किसी व्यक्तिगत सांसद को कदापि उपलब्ध नहीं।अत: संसद-परिसर के बाहर यदि हम अपने प्रतिनिधि या दूसरे जनप्रतिनिधियों के संबंध में कुछ प्रतिकूल विचार प्रकट करें, तो वह संसद की अवमानना अथवा सांसदों के संसदीय विशेषाधिकारों का हनन नहीं माना जाएगा, खासकर तब, जब हमारी मंशा कुटिल और भाषा अशोभनीय न हो।माननीय सांसद ही हमें बताएं कि घोटालेबाजों के लिए ‘भ्रष्टाचारी’, रिश्वत लेने वालों के लिए ‘रिश्वतखोर’, हत्या के आरोपितों के लिए ‘हत्यारा’, काले धन के तस्करों के लिए ‘बेईमान’ तथा संसद के किसी एकांत कक्ष में रतिक्रीड़ा देखने वालों के लिए ‘बेशर्म’ नहीं, तो कौन-सा व्याकरण-सम्मत वैकल्पिक विशेषण होगा? संसद हमारी आकांक्षाओं और आस्था का न्यासी है और उसकी मर्यादा तथा गरिमा को बचाये रखना सांसदों का पूर्ण दायित्व है।यदि उसकी शालीनता भंग होती रही, तो हम अवश्य बोलेंगे।एक प्राणवान प्रजातंत्र का यही लक्षण है, यह गांधी का देश है जो हमें सिविल नाफरमानी की राह दिखा गये हैं, लोग उस राह पर अगर निकल पड़ें, तो जेलों में जगह कम पड़ जायेगी. कस्बे-कस्बे में विशेष अवमानना-कारागृह बनाने पड़ जायेंगे|

साल भर में इन दो आंदोलनों ने पार्टियों के दायरे के बाहर एक बड़ा जनसैलाब तो खड़ा कर ही दिया है, जिससे गड़बड़ करने वाला समुदाय डरा है और आम लोगों का भरोसा बढ़ा है कि वे (यानि जनता) चाहें तो एकजुट होकर लगाम लगा सकते हैं।सरकारी पक्ष, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी जैसों को जितना स्मार्ट समझे पर आम लोगों की नजर में ये क्या ठहरते हैं कहने की जरूरत नहीं है।सरकार और विपक्ष सभी सवालों के घेरे में हैं. संसद को अपने अपमान की चिंता हो यह अच्छी बात है, पर उसे देश और आम लोगों की परेशानियों की चिंता न हो यह गंभीर बात है।अब एक बाबा निकल पड़ा है, जिसके पीछे जोशीले नौजवानों की लंबी कतारें खड़ी हो गयी हैं, इसलिए शोलों को हरगिज हवा न दें।आग अगर भड़क उठी तो आज हमारे बीच कोई महात्मा गांधी मौजूद नहीं, जो धधकती लपटों को समेट ले, तब अंजाम बहुत कुछ वैसा ही होगा जैसा हाल के वर्षो में इराक, मिस्र और लीबिया में हुआ।

बुद्धिजीवियों द्वारा बार-बार क्रांतिकारियों के जमघट को भीड़ की संज्ञा दी गयी।भाई, भीड़ तो मदारी के खेल में होता है और ना बाबा मदारी वाले हैं और ना ये क्रन्तिकारी मजमा देखने वाले।ये सब क्रन्तिकारी (सैनिक) अपने सेनापति के इशारे पर काम करते हैं।तभी तो इतने बड़े जमघट के बावजूद ना सेनापति का दिमाग बौराया और ना ही अनुशासित सैनिकों का।इतने बड़े जत्थे को अकेले संभालना और कोई अप्रिय घटना ना होना, इसे आप छोटी-मोटी बात मानते हैं ? वास्तव में भारत स्वाभिमान के लिए भीड़ कभी कोई समस्या रही ही नहीं।ये तो एक झलक थी अगर सभी भारत स्वाभिमानी दिल्ली की सड़कों पर उतर जाए तो दिल्ली की हर गली बंद हो जाएगी|

अगर आप स्वामी रामदेव जी जैसे अध्यात्मिक जगत के लोगों को समझना चाहते हैं तो गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की लिखी एक पुस्तक "हमारी वसीयत और विरासत" जरूर पढ़े।छोटी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ये समझने के लिए कि अध्यात्मिक जगत के लोगों को हमारी ऋषि सत्ता जो हिमालय की कंदराओं में सुक्ष्म शरीर के रूप में रहती हैं, कैसे कोई कार्य देतीं हैं, संचालित करवाती हैं और उस काम को पूरा भी करवाती हैं।जब स्वामी रामदेव जी कहते हैं कि काला धन वापस आएगा, व्यवस्था रूपांतरित होगी तो आप मान ही लीजिये कि वो होगा, ये बातें वो हमारे मन को बहलाने के लिए नहीं करते हैं।इन लोगों के पास दिव्य दृष्टि होती है जो आपके और हमारे पास नहीं है और ना ही हम अध्यात्मिक रूप से उतने ऊँचे हो पाए हैं।

लोग कहते हैं कि बाबा राजनीति कर रहे हैं, तो कोई मुझे ये बताये कि इस देश में राजनीति के अलावा है क्या ? आप जिस सोसाइटी में रहते हैं, मोहल्ले में रहते हैं, कार्यालय में काम करते हैं, वहां भी तो राजनीति ही हो रही है, आप कैसे अपने को उससे अलग कर सकते हैं ? ये जो मिडिया में बोलने वाले लोग हैं या लिखने वाले लोग हैं वो भी तो राजनीति ही कर रहे हैं, सबको अपने आप को आगे बढ़ाना है, भले देश पीछे रह जाये।यही नेहरु ने किया और यही आज सभी कर रहे हैं तो देश को आगे बढ़ाने के लिए, देश के भले के लिए अगर बाबा राजनीति कर रहे हैं तो क्या बुरा है कम से कम अपने लिए तो नहीं कर रहे हैं ना ? और स्वामी रामदेव जी एक सन्यासी होने के पहले इस देश के नागरिक हैं, ये नहीं भूलना चाहिए इन बिके हुए लोगों को।

बाबा का विरोध ये (मीडिया वाले) क्यों कर रहे हैं ? और भी तो बाबा हैं इस देश में ? बाबा का विरोध इसलिए हो रहा है कि बाबा के समर्थक दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।4 जून के रात की घटना इसीलिए की गयी थी कि बाबा के समर्थक उनका साथ छोड़ दें लेकिन वे फेविकोल के जोड़ की तरह जुड़े रहे और उनसे कई गुणा ज्यादा लोग और जुड़ गए हैं और ये संख्या दिन प्रतिदिन बढती जा रही है,ये उनके चिंता का मुख्य कारण है।और आज आप सबको बताते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है कि भारत स्वाभिमान आज भारत का सबसे बड़ा संगठन हो गया है।

इन बुद्धिजीवियों की समस्या बाबा और उनके समर्थक ही है इसीलिए वो बाबा को गरियाते (गाली देते) रहते हैं। और बाबा हैं कि ना झुक रहे हैं और ना टूट रहे हैं।ऐसा क्यों ? क्योंकि बाबा मन, कर्म और वचन से एक हैं, उनका दामन साफ़ है।4 जून 2011 के बाद भारत सरकार के विभिन्न विभागों की तरफ से पतंजलि योग समिति और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट, हरिद्वार को 64 नोटिस दिए गए हैं, लेकिन किसी को सिद्ध नहीं कर पाए हैं।अभी मैं ये लिख रहा हूँ तब मैं ये देख रहा हूँ कि कस्टम विभाग की तरफ से एक और नोटिस सर्व की गयी है, यानि कुल मिलाकर 65 नोटिस हो गए।टेलीविजन और अख़बार तो नोटिस की खबर को तो दिखाते हैं लेकिन उसके आगे की प्रक्रिया नहीं दिखाते हैं या छापते हैं।14 अगस्त के बाद खाद्य मंत्रालय ने वहां के उत्पादों के नमूने को जाँच के लिए ले गए हैं, हो सकता है कि जैसे उन्होंने आचार्य बालकृष्ण जी को फर्जी तरीके से गिरफ्तार किया वैसे ही इन नमूनों को भी फर्जी तरीके से सिद्ध कर दें कि ये निर्धारित मानदंड के अनुरूप नहीं हैं।

जब आप इंग्लैंड के इतिहास का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि इंग्लैंड हमेशा अपने आस-पास के देशों से युद्ध में उलझा रहा लेकिन साथ ही साथ विश्व में भी अपनी विजय पताका फहराता रहा, शायद अंग्रेजों से ही प्रेरणा लेकर स्वामी रामदेव जी काम कर रहे हैं।केन्द्र सरकार के उनके विरुद्ध के रवैये के बावजूद वे देश भर में लोगों के बीच जाकर राष्ट्रभक्ति का संचार कर रहे हैं,लोगों को जागृत कर रहे हैं।संकल्प आपका बड़ा है और उत्साह आपमें हैं तो आप दुनिया को जीत सकते हैं |

आप भारत के लोगों को देखेंगे तो पाएंगे कि यहाँ के 90% लोग टेलीविजन देखकर और अख़बार पढ़कर अपनी विचारधारा बनाते हैं, मान्यताएं गढ़ते हैं, इसीलिए अपनी स्वयं की विचारधारा का निर्माण नहीं कर पाते और वो हमसे वही प्रश्न करते हैं जो टेलीविजनों पर दिखाए जाते हैं, अख़बारों में छापे जाते हैं, जैसे

प्रश्न - बाबा के पास तो खुद काला धन है, वो काला धन की बात क्यों कर रहे हैं ?

उत्तर है - सरकार के पास असीमित शक्ति है, वो एक-सवा साल में ये क्यों नहीं सिद्ध कर पाई है ?

प्रश्न - बाबा के पास तो यूरोप में द्वीप है, उसके लिए पैसे कहाँ से आये ?

उत्तर है - ब्रिटेन और यूरोप में रहने वाले भारतीयों और भारत वंशियों ने ये द्वीप खरीद कर बाबा को भेंट दिया है, वो बाबा में श्रद्धा रखते हैं इसलिए उन्होंने ऐसा किया |

प्रश्न - बाबा तो व्यापारी हैं |

उत्तर है - बाबा स्वदेशी उत्पादों को इस्तेमाल करने के लिए कहते रहे हैं, लेकिन क्या कह देने मात्र से ये हो जायेगा ? इसीलिए बाबा ने विकल्प के तौर पर अपने यहाँ स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन शुरू किया है।विदेशी कंपनियाँ जीरो तकनीक के बने सामानों का उत्पादन करती रही हैं और बाबा ने जीरो तकनीक की वस्तुओं का उत्पादन कर के भारत के लोगों को राह दिखाने का ही काम किया है।

Please listen this audio clip. Interesting conversation between Prabhu Chawla and Amar Singh. Total exposure of how news is manipulated by the media in favour of politicians of this country. Click on the link।ये पुरानी बात है लेकिन ये आपके समझने के लिए है कि कैसे मीडिया को मैनेज किया जाता है।
http://soundcloud.com/chaubey/ prabhu-chawala-and-amar-singh

अब मैं अगस्त, 2012 के आन्दोलन से उठे कुछ प्रश्नों की ओर आता हूँ |

प्रश्न - इस आन्दोलन का उद्देश्य क्या था ?

उत्तर - इस आन्दोलन का उद्देश्य था कि लोगों को काले धन के प्रश्न पर जगाये रखना है।भारत स्वाभिमानी तो जानते हैं लेकिन इस विषय को देश के बच्चे-बच्चे को बताना है ये मुख्य उद्देश्य था और इस बार का आन्दोलन ये करने में सफल रहा।

प्रश्न - स्वामी जी कह रहे थे कि ये निर्णायक आन्दोलन होगा, क्या निर्णय हुआ इस आन्दोलन में ?

उत्तर - निर्णय यही हुआ कि कांग्रेस को हराना है और आन्दोलन जारी रहेगा तब तक, जब तक कि हम काला धन को भारत में वापस नहीं ले आयेंगे, व्यवस्था का रूपांतरण भारतीय मूल्यों के आधार पर नहीं कर लेते।

प्रश्न - आंबेडकर स्टेडियम में ही रुक कर इस अनशन को क्यों नहीं जारी रखा गया ? या आंबेडकर स्टेडियम से वापस रामलीला मैदान पर आकर इस अनशन को जारी रखा जाता।

उत्तर - स्वामी रामदेव जी ने बहुत स्पष्ट कह दिया था कि "भैंस के आगे बीन बजाने से कोई फायदा नहीं है"।और दूसरी बात कि दिल्ली पुलिस ने 13 तारीख की शाम को ही मीडिया के सामने कह दिया था कि "हमने सभी आन्दोलनकारियों को छोड़ दिया है और वो कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं"।14 तारीख को भी दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारी ने मीडिया के उपस्थिति में फिर से निवेदन किया कि 15 अगस्त के वजह से सुरक्षा कारणों से आप अपना आन्दोलन ख़त्म कर दें।(इस दो बार के निवेदन के बाद पुलिस कुछ भी करने को स्वतंत्र थी) अब दो बार निवेदन करने के बावजूद भारत स्वाभिमानी वहां से जाने को तैयार नहीं थे लेकिन मैं भारत स्वाभिमान के सैनिकों का बहुत सम्मान करता हूँ कि एक अनुशासित योद्धा की तरह उन्होंने अपने सेनापति की बातों का सम्मान किया और स्वामी जी के कहने पर वहां से सम्मानजनक तरीके से और विजयी भाव के साथ निकले।ये अगस्त आन्दोलन ख़त्म हुआ है लड़ाई नहीं, लड़ाई जारी है।

You are here: