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ईमानदारों से धोखा

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deepak-mahanसालों से चर्चा है कि अमीर भारतीयों का काला धन स्विस बैंकों में जमा है औरअगर य़े पैसा स्वदेश आ जाये तो उससे भारत की समृद्धी में चार चाँद लग जाएँ। पर गरीबी हटाने की बात करने वाली भारतीय सरकारों ने, कोहिनूर से लेकरकाले धन तक, किसी को भी स्वदेश वापस लाने के लिए कभी निष्ठा से कोई प्रयास नहीं किया और समस्या ज्यों कि त्यों बनी हुई है। अरसे से अटकलें य़े भी थीं कि जिस प्रकार अमरीकी और जर्मन सरकारों ने स्विस बैंकों को डरा धमका कर अपने देश के काले धन निवेशकों की लिस्ट हासिल कर और उनसे ब्याज लिया था, उसी प्रकार हमारी सरकार भी भारतीय खाताधारियों के विवरण प्राप्त कर, उन्हें दण्डित कर, काला धन स्वदेश ले आयेगी। पर आशा के विपरीत, खबर है की केंद्रीय वित्त मंत्रालय विदेशोंमें काला धन रखने वाले भारतीयों को क्षमादान देने की एक स्वैच्छिक आय प्रकटीकरण योजना बना रहा है।

इसके तहत जो लोग अपने विदेशी खातों की राशी स्वदेश लायेंगे, उन्हें तीस फीसदी आयकर के अतिरिक्त एक मुश्त दंड-कर चुकाने पर, शेष पैसे अपने पास रखने की आजादी होगी। सुनने में य़े भी आया है कि इस नयीक्षमादान योजना को देश के शीर्ष उद्योगपतियों के सुझाव पर बनाया गया हैजिनका मानना है कि य़े तभी सफल होगी अगर काले धन के मालिकों केनाम उजागर नहीं किये जाएँ और उन्हें कानूनी दंड नहीं दिया जाये। ध्यानदेने योग्य बात य़े है कि 1951 के बाद से आज तक भारत सरकार ने पांच बारस्वैच्छिक आय प्रकटीकरण योजनायें लागू की हैं और हरेक बार यही दलील दीजाती है की इससे काले धन की अगाध राशी देश को वापस मिल जायेगी। परहकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ और स्थिति जटिल ही बनी रही।

खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मानते हैं कि "अतीत में लागू की गयी ऐसीक्षमा योजनायें काले धन के स्थायी इलाज में असफल रही हैं और देश को इसबुराई से छुटकारा दिलाने के लिए व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने कीजरूरत है।" उपरोक्त घटनाक्रम से प्रतीत होता है कि एक बार फिर प्रधान मंत्रीमूकदर्शक बन कर धनाढ्य वर्ग की सुविधा हेतु घुटने टेकने के लिए तैयार हैं। ज्ञातरहे ऐसी आखिरी योजना 1997-98 में घोषित की गयी थी जिससे सरकार कोसिर्फ दस हजार करोड़ रुपए का कर-राजस्व मिला था जबकी काले धन की रकम अरबों-खरबों में बतायी जाती है।

राष्ट्रीय धन भारत को पुनः मिल जाये इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिनय़े विचारणीय है कि क्या ऐसा क्षमादान इमानदार करदाताओं का अपमान नहीं ?क्या य़े नाइंसाफी नहीं कि जो इमानदारी से राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है, उसेतो नियमित रिफंड के लिए भी दर-दर भटकना पड़ता है और बेईमानों के लिएसरकार ना केवल रियायतों के अम्बार लगाती है बल्कि नतमस्तक हो स्वागत भी करती है? जब रिज़र्व बैंक को बिना बताये बाहर पैसा ले जाना कानूनी अपराध है तो क्या अपराधीयों को अनुचित और अनैतिक कार्यों के लिएमाफी दे छोड़ना सही है? तर्क तो कहता है की जो पैसा विदेशी खातों में जमा है वोशायद गैर कानूनी कमाई है वरना उसको छुपाने की क्या ज़रुरत पड़ी थी और ऐसे पैसे पर किसी व्यक्ती विशेष का हक़ ही नहीं बनता।

इसमें शक नहीं की य़े सुझाव राजनैतिक पार्टियों के शुभचिंतकों ने दिए होंगे जो गाहे-बगाहे चुनाव के समय राजनीतिज्ञों के काम आते हैं। तमाम अटकलों केमुताबिक विदेशों में अत्यधिक काला धन व्यापारियों, राजनीतिज्ञों, अफसरों,फ़िल्मी सितारों और सट्टेबाजों का है और ऐसी योजना का संपूर्ण लाभ इन्ही लोगोंको मिलेगा, किसी आम आदमी को नहीं। ऐसे में जब कानून सब के लिए समान है, तब बार-बार अपराधियों को ऐसी रियायतें क्यूँ दी जाती हैं जबकि वो देश के कानून की हमेशा से ही अवहेलना करते आ रहे हैं? ऐसे लोगों के नाम उजागर करने में क्या मजबूरीयाँ हैं जबकि विकीलीक्स के युग में आज नहीं तो कल इन लोगों के नाम प्रकाशित होके रहेंगे। राजीनीति में अक्सर जो दिखता है वही सत्य नहीं होता, तो कहीं ऐसा तो नहीं की भ्रष्टाचार के प्रति बढते आक्रोश को शांत करने के लिए काले धन की वापसी के प्रयास तो किये जा रहे हैं, परन्तु बहुत से "प्रभावशाली" लोगों और उनकी सम्पती को बचाने की भी तैयारी की जा रही है?

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