टीवी चैनलों का दिमागी दिवालियापन
- दिल की कलम से
- बुधवार, 19 अक्टूबर 2011 11:29
- दीपक महान (वृतचित्र निर्देशक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार)
आजकल जिस प्रकार से इलेक्ट्निक मीडिया द्वारा समाचारों का प्रसारण किया जा रहा है, उसे देख कर ना केवल टेलीविजन के पुरुधाओं को दुःख होता है बल्कि भविष्य के लिए चिंता भी होने लगी है। ऐसा लगता है जैसे छोटे परदे पर कोई निकृष्टता की दौड़ चल रही है जिसको जीतने के लिए सब चैनल लालायित हैं और जाने माने वकील प्रशांत भूषण को टीवी पर पिटते देख तो य़े बात और पुख्ता हो गई कि आजकल प्रतिस्पर्धा ने चैनलों से उनका विवेक ही छीन लिया है। हमलावर कितने भी सिरफिरे रहे हों, य़े बात किसी के समझ नहीं आयी कि आखिर क्यूँ जब य़े घटना घटी उस समय वहाँ पर उपस्थित "टाइमस नाउ" चैनल की समाचार टीम ने भूषण का बचाव नहीं किया और कैसे घटना को कैमरे में कैद करना किसी मनुष्य के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया?
कुछ लोग इस कार्य को नैतिकता का जामा पहना कर कर्तव्य परायणता की मिसाल दे सकते हैं लेकिन शायद य़े स्वार्थ से प्रेरित ऐसा दुष्कार्य है जिसका मकसद सिर्फ य़े साबित करना था की इस घटना के चश्मदीद और अनन्य द्रश्य सिर्फ एक चैनल की टीम के पास थे। य़े बात यूँ भी साबित हो गयी जब घटना के चंद मिनटों बाद ही उस चैनल ने इन दृश्यों को अपनी टीम का "एक्स्क्लुसिव कवरेज" बताना शुरू कर दिया। टीवी चैनल के उद्घोषक के लिए विकट स्थिती तब उत्पन्न हुई जब प्रशांत भूषण के पिता शांतिभूषण ने चैनल की समाचार टीम को उनकी कायरता के लिए दुत्कार दिया! शांतिभूषण का कहना था कि मूक दर्शक बन घटना की रेकॉर्डिंग करना एक बचकाना हरकत थी और उनका पहला फ़र्ज़ मनुष्य की जान बचाना होना चाहिए था।
पर ऐसी एक नहीं अनेकों बचकानी हरकतें आजकल टीवी समाचार चैनलों पर हर रोज़ देखी जा सकती हैं। मसलन के लिए प्राईम टाइम पर कुछ बेहद उबाऊ लोगों की पैनल वार्ता जिसमें दर्शकों को एक आदर्श परिचर्चा का वादा तो किया जाता है पर हकीकत में मुद्दों के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने की बजाये समय ही नष्ट किया जाता है। य़े इसलिए होता है कि प्रत्येक टीवी चैनल अपने पास कुछ पसंदीदा लोगों का पैनल है जो संवाद कम और उत्तेजनात्मक बहस ज्यादा करते हैं।
पत्रकारों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और विशेषज्ञों की इस निश्चित सूची से भी दो कदम आगे हैं राजनैतिक पार्टियों के वो प्रवक्ता जो अपनी अपनी बात मनवाने के लिए ना केवल उग्रता से ओछी टिप्पणियाँ कर, शोर करते हैं बल्कि विषयवस्तु को ही गौण बना देते हैं। य़े चुनींदा लोग भले ही वाक्चातुर्य और सामाजिक गंठजोड़ में माहिर हों पर उनके व्यक्तिगत स्वार्थ, हठधर्मिता और राजनैतिक पक्षपात से उत्पन्न विचारों के कारण, दर्शकों को परीचर्चा से कोई ज्ञानवर्धक और सैद्धान्तीक लाभ नहीं मिलता।
कभी कभार अगर कोई सार्थक चर्चा चलती भी है तो चैनल समय इतना कम देते हैं कि विषय की तह में जाना ही मुनासिब नहीं होता और निहायत असंवेदनशील अंदाज़ में विशेषज्ञों को चुप करा दिया जाता है। कुल मिला कर अधिकतर चैनलों का उद्देश्य ऐसी द्रश्यावली प्रसारित करना रह गया है जिससे सनसनी पैदा हो जाये भले ही उससे समाज का कितना ही नुक्सान क्यूँ ना हो। कुछ अरसे पहले तक सिर्फ टीवी धारावाहिकों को बेहूदगी का पर्याय माना जाता था पर अब जिस प्रकार से टीवी के समाचार चैनल आपत्तीजनक और गैर ज़िम्मेदार द्रश्य परोस रहे हैं, उससे लगता है कि उन्होनें बेहूदगी की सारी हदें पार कर ली हैं। हाल ही में एक बच्चों की फिल्म का य़े जुमला कि "आजकल अगर कोई मुर्गी किसी दिन पांच अंडे दे दे तो वो भी टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती है" इस गैर जिम्मेदाराना रवैये को पूरी तरह व्यक्त करता है।




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