अगर जरा भी गैरत बाकी है तो कुर्सी छोड़िये...
- अपनी बात
- शुक्रवार, 22 जुलाई 2011 15:51
- Super User
मुंबई के बम धमाकों ने देश के हर आदमी को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन अगर किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ा है तो वे हैं राजनेता- वे काँग्रेस में भी हैं और भाजपा में भी कम्युनिस्ट पार्टी में भी हैं और दूसरी पार्टियों में भी।

मुंबई के बम धमाकों ने देश के हर आदमी को झकझोर कर रख दिया है, लेकिन अगर किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ा है तो वे हैं राजनेता- वे काँग्रेस में भी हैं और भाजपा में भी कम्युनिस्ट पार्टी में भी हैं और दूसरी पार्टियों में भी। एक आम आदमी की मौत उनके लिए टीवी के घृणित परदे पर अपनी मनहूस सूरत दिखाने और एक दूसरे के कपड़े उतारने से ज्यादा कोई अहमियत नहीं रखती। सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। नंगे, बेशर्म और क्रूरता व बेशर्मी को मात देने वाली तमाम धूर्तताओं में सभी पारंगत हैं। टीवी पर इनके चेहरे देखिये रेल दुर्घटना हो या बम विस्फोट की घटना, इनके चेहरों को देखकर तो गिरगिट भी मुँह छुपा लेता होगा- नेताओं की ये जात कितनी बेशर्म और निर्लज्ज है, ये अपने ही लोगों की मौत पर, उनकी लाशों पर रोटियाँ सेंकने निकल पड़ते हैं और टीवी के परदे पर मिल बाँट कर खाते हैं। खबरिया चैनल के बेशर्म एंकर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए दो-दो कौड़ी के सवाल पूछकर पूरी बहस को कुत्ता फजीती में बदल देते हैं।
अगर पत्रकारिता कहीं थोड़ी बहुत बची है तो प्रिंट मीडिया में, क्योकि यहाँ लिखने वाले को कुछ सोचकर लिखना पड़ता है, और पढ़ने वाला भी क्योंकि पढ़ा-लिखा होता है उसे पढ़कर उसमें कुछ सोच और विचार पैदा होता हैं। लेकिन टीवी पर खबरें परोसने वाले न सोचते हैं न समझते हैं वे किसी क्रूर विदूषक की तरह राजनेता रुपी दो दो कौड़ी के इन विशेषज्ञों से मातम पर पटाखे छुड़वाते हैं ताकि उनकी टीआरपी सब पर भारी रहे। यहाँ मौत, अपराध, दुर्घटना और हिंसा संवेनदनशीलता की नहीं टीआरपी की खबर होती है। टीआरपी के आगे सारा ईमान धरम और नैतिकता बलि चढ़ा दी जाती है।
मुंबई बम धमाकों पर दैनिक भास्कर के संपादक श्री कल्पेश याज्ञिक ने इन्हीं भावनाओं और संवेदानओं के साथ तीखे तेवर वाला संपादकीय लिखा है, इसे पढ़कर इस देश के नेताओं, मंत्रियों, भावी प्रधान मंत्रियों और प्रधान मंत्री से लेकर राष्ट्रपति को जरुर शर्म आनी चाहिए कि इस देश में सर्वोच्च कुर्सियों पर बैठकर उन्होंने किस निर्लज्जता से देश को आतंकवादियों, बलात्कारियों और अपराधियों के हवाले कर दिया है।
प्रस्तुत है कल्पेश याज्ञिक का विशेष संपादकीय
अब गंभीर चेहरे मत बनाइएगा। झूठे सांत्वना के शब्द मत उगलिएगा। सच्ची ही होगी, किन्तु श्रद्धांजलि मत दीजिएगा। पाकिस्तान का नाम मत लीजिएगा। ख़ासकर उसे सुबूत सौंपने की हल्की बात मत कहिएगा। आपात बैठकें लेते रहें, किन्तु उनमें कितनी ठोस बातें कीं, यह मत बताइएगा।
घिन आती है। घबराहट होती है। घुटन होती है।
चाहे जैसी सत्ता चलाते रहें, लेकिन हम आम लोगों को ख़ास सपने मत दिखाइएगा। आतंक के विरुद्ध युद्ध का दावा तो भूलकर भी मत कीजिएगा। मुंबई के सिलसिलेवार धमाकों पर भी भारी पड़ने वाले वाचालों को तो बिल्कुल मत बोलने दीजिएगा। गेटवे के विस्फोटों से लेकर 26/11 के हमलों में किए कागजी उपायों को मत दोहराइएगा। और सुरक्षा के लिए चिंता या कड़े कदम अब कतई मत उठाइएगा।
टीस सी उठती है। टूट से जाते हैं। टकराकर लौट आती है- हर आस।
हमलों से समूचा राष्ट्र भले ही दहल गया हो, आप हिम्मत मत दिखाइएगा। अकेले मुंबई में ही 1993 से सिलसिलेवार हमलों में अब तक 700 निर्दोषों की जान जाने के सिलसिले पर बेबसी मत जताइएगा। और सबसे बढ़कर, कार्रवाई करने का श्रेय लेने की तो कोशिश भी मत कीजिएगा। गृहमंत्री को मत हटाइएगा। मुख्यमंत्री मत बदलिएगा। शिवराज पाटिलों, अशोक चव्हाणों के उदाहरण मत सुनाइएगा।
कर्कश लगते हैं। कान फटते हैं। कुंठा बढ़ाते हैं।
और सबसे अलग मुद्दा- हमारे देश को हमारा देश ही रहने दें, विश्व शक्ति मत बनाइएगा। एटमी सौदे को ‘मान’ का प्रश्न बनाया, लेकिन आतंकी धमाकों को रोकने में जान मत लगाइएगा। पौने दो लाख करोड़ का 2जी घोटाला करवाइएगा, लेकिन आतंक की सेकंड और थर्ड जनरेशन को मत पहचानिएगा। घोटालों के टेप खुफिया तरीके से लीक होने से नाराज़ हुए थे, लेकिन देश की सुरक्षा लीक करने वाले खुफिया अमले को कुछ न कहिएगा। खेलों, अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों को लुटते देखिएगा किन्तु सैकड़ों मासूमों को बेसहारा-बर्बाद होते मत देखिएगा।
धधक जाते हैं। धड़कनें तेज हो जाती हैं। ‘धिक्कार है’- मन के भीतर से निकलता है।
पहले वे थे- तो कहते थे, ‘सब्र का बांध टूटने वाला है,’ अब आप हैं, कहा था, अगली बार सहन नहीं करेंगे। वे हमें तोड़ गए किन्तु सब्र न छोड़ा। आप का ‘अगली बार’ आ गया, जीवन के शिखर पर सचमुच अवसर है, सहन मत कीजिएगा। कई व्यवस्थाएं स्वत: कायर होती हैं। इर्द-गिर्द नाकारा घेरा हो तो नेतृत्व भी अकर्मण्य हो जाता है। कायरता, वीरता को धकेल देती है। किन्तु इतनी बड़ी सेना में कुछ तो योद्धा होंगे? उन्हें ईश्वर के लिए, देश के लिए, मत रोकिएगा।
(लेखक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं।)





प्रेम भरोसा मांगता है। छल उसे कमजोर ही नहीं बनाता बल्कि उसे दूर भी कर देता है। सो निर्देशक अमित कसारिया की फिल्म आई डोंट लव यू भी ऐसे युवा दिलों की कहानी कहती है .
कहते हैं सपनों की कीमत अपनों से ज्यादा नही होती ..लेकिन कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपनों और रिश्तों को परवाह नहीं करते। औरंगजेब भी एक ऐसे ही साम्राज्य की कहानी कहती है.