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22-12-2014

नए साल के लिए कुछ खास दोहे और गज़लें

नए साल के मौके पर हमारे पाठकों ने कुछ चुनिंदा गज़लें भेजी है –नए साल की शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है ये यादगार गज़लें-जो आपको अपने आसपास के माहौल से रु-ब-रु कराते हुए कुछ सोचने पर मजबूर करेगी।

जब नया साल आता है
डॉ. जगदीश व्योम
दादी कहती है कि

जब जब नया साल आता है
महँगाई की फुटबॉल में
दो पंप हवा और डाल जाता है
गरीबी की चादर में
एक पैबंद और लगाकर
भ्रष्टाचार का प्रमोशन कर जाता है
ईमानदारी कहीं बदचलन न हो जाए
इसलिए
बेईमानी का पहरा बैठा जाता है
मटर के खेतों की रखवाली
बकरों को सौंप जाता है।

दादी यह सब देखकर
जाने क्यों चिढ़ती है
शायद सठिया गई हैं
अरे ठीक ही तो है
नया साल आएगा
खुशियाँ लाएगा
महँगाई की फुटबॉल को
थोड़ा और फुला जाएगा
खेलने में खूब मज़ा आएगा।

कवि भारत भूषण आर्य के दोहे
बोया था क्या घुन लगा, आजादी का बीज।
इतने सालों बाद भी, तन पर फटी कमीज।।
दर्पण तोड़ा काग ने, हंस हुआ बदनाम।
सिर पर लगा कपोत के, हत्या का इल्जाम।।

कुँवर कुसुमेश की गज़लें


लो नया आफ़ताब सर पर है,
आदमी फिर नये सफ़र पर है।

तुमको कितने क़रीब से देखे,
ये नये साल की नज़र पर है।

लोग निकले बधाइयाँ देने ,
बात ठहरी अगर-मगर पर है।

कितनी ऊँची उड़ान ले लेगा ,
ये परिंदों के बालोपर पर है।

लोग पत्थर लिए नज़र आये,
कोई फल-फूल क्या शजर पर है?

सोच इन्सान की बदल देना,
एक फ़नकार के हुनर पर है।

भूल जाये भले ही ये दुनिया,
पर भरोसा हमें 'कुँवर' पर है।


दुष्यंत कुमार की गज़लें
हो गई है पीर पर्वत -सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए ।
आज यह दीवार ,परदों की तरह हिलने लगी ,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए ।
हर सड़क पर ,हर गली में, हर नगर, हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए

तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए।
यहाँ तक आते -आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं,

जिन्दगानी का कोई मकसद नहीं हैं
एक भी कद आज आदमकद नहीं हैं,

रोज़ जब रात को बाहर का गज़र होता है
यातनाओं के अंधेरे में सफ़र होता है,

हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये,

कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिये
कहाँ रोशनी मयस्सर नहीं शहर के लिये।

"इस नदी की धार में ठण्डी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ़ लाओ दोस्तों
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है।"
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।

अदम गोंडवी की गज़लें
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं
दिल पर रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है ?

मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है
लगी है होड़ सी देखो अमीरी-औ-गरीबी में
ये गाँधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज़ चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है।
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

मदन मोहन शर्मा की गज़लें
खुश्क मौसम को सिखा दे प्यार कुछ ऐसे बरस
आग पानी से करे सिंगार कुछ ऐसे बरस

फूंक दे मौका परस्तों की ठगों की बस्तियाँ
बूंद जालिम को बने अंगार कुछ ऐसे बरस

मुल्क के सौदागरों के तन बदन पर जब गिरे
धार हो तलवार की सी धार कुछ ऐसे बरस

हर झड़ी में ताजगी का जोश का अहसास हो
दाग धरती के धुलें इस बार कुछ ऐसे बरस

थी फलों की आस जिनसे वो तने सड़ गल गए
हो नयी फिर से फसल तैयार कुछ ऐसे बरस


लोक-सरोकार के महाकवि आचार्य भगवत दुबे की कुछ खास गज़लें

क्या लिखूं राष्ट्र की रपट बन्धु, नेतृत्व गया है भटक बन्ध
कश्मीर, आन्ध्र, आसाम सहित, घायल है केरल कटक बन्धु
चूहे चालाक, चुनावों में, दिग्गज को देने पटक बन्धु
आचार्य, मौलवी विष उगलें, यह बात, रही है खटक बन्धु
सहमी सिसक रहीं झोपडि़याँ बढ़ती शीतनिशा मॅंहगाई घटते दिन ज्यों आमदनी से,
पाखण्डों का बोझ लदा तो, कूबड़-सी झुक गई अलगनी
शेष बचे वृक्षों के जहाँ अभी अंश, वहीं बचा नीर कहीं, आशा के हंस
हरे भरे दृश्य, वहीं फूल लाल लाल, गदराए गोरे-से महुआ के गाल

माँग खाली व पुछा आँख का जल पढ़ना, काई हिरणी भी वही वक्त से घायल पढ़ना
इनमें अपनी ही बहिन बेटियाँ सिसकती हैं, किसी तवायफ की बजती हुई पायल पढ़ना
आप शोहरत के लिए दूर, बहुत दूर गए, ऊब जाओ तो कभी गाँव का पीपल पढ़ना


चाटुकारी की पुस्तक पुरस्कृत हुई, पृष्ठ कुर्बानियों के निकाले गये,
तोंद भरने तिजोरी की, गोदाम की, भूखे बच्चों के छीने निवाले गये
प्रश्न होते रहे, दफन फाइल में सब, सिर्फ नरों मे उत्तर उछाले गये
मंदिरों-मस्जिदों मेंअमन के लिये, फिर दुआ करने को बरछी-भले गये ।

रत्न प्रताप सिंह की गज़लें

भूख की चौखट पे आकर कुछ निवाले रह गए
फिर से अंधियारे की ज़द में कुछ उजाले रह गए

आपकी ताक़त का अंदाजा इसी से लग गया
इस दफे भी आप ही कुर्सी संभाले रह गए

देवेंद्र गौतम की गज़लें
सिलसिला रुक जाये शायद आपसी तकरार का।
रुख अगर हम मोड़ दें बहती नदी की धार का।

जब तलक सर पे हमारे छत सियासत की रहेगी
टूटना मुमकिन नहीं होगा किसी दीवार का।


पूर्णिमा वर्मन की काव्यमय शुभकानानाएँ
शुभ स्वप्नों सा सूर्य उदय हो
नया साल मंगलमय हो।

जो सपने हों सब अपने हों
हर मेहनत के फल दुगने हों
अक्षत रोली तीज या होली
सा जीवन सुखमय हो
नया साल मंगलमय हो।

मित्रों की सदभावनाएँ हों
मन में ऊँची कामनाएँ हों
गीत की धुन-सा किसी शगुन-सा
घर आँगन मधुमय हो
नया साल मंगलमय हो

हों पूरी सारी आशाएँ
साम स्वस्ति से सजें दिशाएँ
सीप में मोती दीप में ज्योति
जैसा सुफल समय हो
नया साल मंगलमय हो

गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ व दोहे

(खुले आसमान के नीचे डेरे वाले भरत राष्ट्र को नव वर्ष की शुभ कामनाएँ )

एक साल घट गया तुम्हारा और उमर बढ़ गई काल की,
कौन बधाई कौन कामना ऐसे में दूँ न ए साल की
कैसा साल खुशहाली कैसी जो भूखे तारे गिनवाए
कोने में कंबल काँपे तो खुली रजाई उसे चिढ़ाए
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?

तन पर वस्त्र पेट में रोटी तब माथे पर चंदन भाए
भूखी मरी ठंड में धनिया होरी कैसे गीत सुनाए
जो भूखे गाता हो गाए, रामराज्य लाता हो लाए
अपने राम तो एक बेर को, भूखे बैठे आस लगाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?

कोई लाया स्वर्ग धरा पर, कोई लाया पावन गंगा
फिर भी रहा अछूत सभी से, झोपड़ वाला मानव नंगा
नाच रहा है बिना नचाए, जो शर्माता हो शरमाए
फटी लँगोटी के भीतर की कोई कब तक देह छुपाए?
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल ग ए आए पर किसको क्या दे पाए?

कई साल भूकंप खा गया कई वर्ष मानवी त्रासदी
आगलगे घर-बार छोड़ कर फुटपाथों पर खुशी बाँट दी
भूखे नींद न आई दिन भर डर में जग कर रात बिताए
घाटी से संसद तक पर हैं दुश्मन बैठे घात लगाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?

दिन को लिखूँ रात अँधियारी और रात को लिखूँ सवेरा
थाली का बैंगन बन डोलूँ यह स्वभाव भी रहा न मेरा
भले चाटता मिले धूल वह ,भले सफलता एक न पाए
चाह रहा फिर भी जग मुझको इधर-उधर लुढ़काता जाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल गए आए पर किसको क्या दे पाए?
प्यार भरा यदि घर में हो तो बच्चा भी भूखा रह लेगा
मन के दर्द व्यथाएँ सारी दिल के अंदर ही रख लेगा
नव वसंत की आशा में ही हर उपवन पतझर सह जाए
बढ़ी उमर घट जाए काल की और वही तुमको लग जाए।
गया साल जाता हो जाए नया साल आता हो आए
कितने साल ग ए आए पर किसको क्या दे पाए?

शमशेर की गज़लें
"जमाने भर का कोई इस कदर अपना न हो जाये
कि अपनी ज़िन्दगी खुद आपको बेगाना हो जाये।

सहर होगी ये रात बीतेगी और ऐसी सहर होगी
कि बेहोशी हमारे देश का पैमाना हो जाये।"

ऐसी हालत में क्या किया जाये
पूरा नक्शा बदल दिया जाये

देश का क्लेश मिटे इस खातिर
फिर नये तौर से जिया जाये।

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