एक दीवाना था [हिंदी ड्रामा]
- फिल्म समीक्षा
- सोमवार, 20 फरवरी 2012 13:24
- रामकिशोर पारचा
दो टूक : प्यार या तो होता है। या नहीं होता।ये किसी की जरुरत भी नही होता। फिर भी हमारी एक ऐसी जरुरत बन जाता है जो सबकुछ बदल देता है।हमें भी और हमारी जिंदगी को भी।बस इतनी से बात कहती है निर्देशक गौतम मेनन की प्रतीक, एमी जैक्सन,मनु ऋषि ,सचिन खेडेकर,अमृता,सामंथा रुथ प्रभु,बाबू अन्थोनी,अश्विन कुकुरम और विकास मेनन के अभिनय वाली फिल्म एक दीवाना था भी एक ऐसे ही प्रेम की कहानी को दिखाती है।फिल्म गौतम मेनन की ही तमिल फिल्म विन्नैथांडी वरुवाय का हिंदी रीमेक है।
कहानी : फिल्म की कहानी सचिन [प्रतीक बब्बर] और जैस्सी [एमी जैक्सन]की है। इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाला सचिन फ़िल्मी दुनिया में कैमरामैन अनय [मनु ऋषि] के साथ सहायक है और अपनी एक फिल्म बनाने का सपना देखता है।वो अपने परिवार के साथ जुहू के एक अपार्टमेन्ट में किराए पर रहता है। जबकि जैस्सी एक रुढ़िवादी मलयाली इसाई लड़की है और अपने परिवार के बिना कुछ नहीं सोचती।लेकिन जब सचिन उसे प्यार कर बैठता है तो सबकुछ बदल जाता है। जैस्सी के परिवार वाले उसे केरल भेज देते हैं ताकि उसकी शादी की जा सके।सचिन भी अनय के साथ वहाँ पहुँच जाता है।सचिन उसे मिलता है और इस बार जैस्सी उसके प्यार को स्वीकार कर लेती है।पर बात यहीं खत्म नहीं होती।जैस्सी के परिवार वालों को पता चल जाता है और वे उसे अमेरिका भेज देते हैं।सचिन को उसकी बहन बताती है कि उसकी शादी हो गई है। अन्तत सचिन अपने काम में व्यस्त हो जाता है पर जैस्सी को नहीं भुला पाता। दो साल बाद आगरा में वो अपनी फिल्म की शूटिंग कर रहा है और नाम है जैस्सी। लेकिन वो नहीं जानता कि ताजमहल को कैमरे में कैद करते करते उसके फ्रेम में उसे तलाश कर रही उसकी जैस्सी भी कैद हो जाएगी।यही इस प्रेम कहानी का सुखद अंत भी है।
गीत संगीत : फिल्म में जावेद अख्तर के लिखे गीत हैं और संगीत ए आर रहमान का है।फिल्म के गीत मूल तमिल फ़िल्म के ही गीतों का हिन्दी रूपान्तर हैं पर एक गीत रहमान ने हिन्दी फ़िल्म के लिये विशेष रूप से नया रचा है।फिल्म के सभी गीत सुनने लायक हैं तो इसकी वजह भी है।रहमान के संगीत में प्रेम और उसके स्वर का आरोह,अवरोह,विरह और मिलन का संयोजन किया गया है। खासतौर से लिओन और सुज़ैन के गाये होसाना जैसे बोलों वाले गीत में। तमिल फ़िल्म में भी ये गीत बहुत पसंद किया गया था।पर मेरी पसंद है फिल्म में मधुश्री का गया शर्मिंदा हूँ जैसे बोलों वाला गीत। तमिल फ़िल्म में यह गीत श्रेया घोषाल ने गाया था लेकिन हिंदी में भी रहमान ने इस गीत को अद्भुत स्वरों वाला बना दिया है।इसके अलावा भी जावेद अली का गाया जोहरा जबीं, राशिद और श्रेया का गाया सुन लो ज़रा जैसे गीत भी आपको पसंद आयेंगे।
अभिनय : फिल्म के केंद्र में प्रतीक बब्बर हैं। सच पूछे तो मैं प्रतीक के लिए एक बात कहना चाहता हूँ।वे सही मायनों में व्यवसायिक फिल्मों के अभिनेता नहीं हैं पर उलझे मन और पशोपेश में घिरे नायक वाली किसी भी भूमिका को वे अद्भुत संवेदनशीलता के साथ कर सकते हैं।इस फिल्म में उन्हें देखकर लगता है कि उन्होंने अपनी धोबी घाट और माय फ्रेंड पिंटू से अभिनय के कुछ सांकेतिक तत्व ही नहीं सीखे हैं बल्कि उनकी परिपक्वता को भी समझ लिया है।एक शर्मीले और आत्मकेंद्रित लेकिन अपने पात्र के चरित्र में उन्होंने नयी शारीरिक भाषा और संवाद अदायगी का संतुलित तालमेल दिखाया है।एमी जैक्सन सुंदर दिखी हैं और एक मलयाली इसाई लड़की की भूमिका में उन्होंने मेहनत की है। एक द्वन्द में उलझी लड़की का चरित्र उन्होंने जीवंतता के साथ बुना है।फिल्म का एक दृश्य हैं जब वे अपनी शादी से इंकार के बाद प्रतीक से अपने ही घर में छुपकर मिल रही हैं।
प्रतीक के हाथों में उनके हाथ हैं और वे स्वीकार कर रही हैं कि वो चाहते हुए भी उनका प्रेम क्यों नहीं स्वीकार कर सकी पर अब वो चाहे तो उनके साथ चल सकती हैं।इस दृश्य में उन्होंने होंटों और आँखों की अभिव्यक्ति का जबरदस्त प्रदर्शन किया है।पर फिल्म की उपलब्द्धि हैं मनु ऋषि।उनका पात्र ही दरअसल प्रतीक का आधार बिंदु भी है और उनके साथ एमी उसका नया विस्तार।सचिन खेडेकर ठीक हैं और एमी के पिता बने बाबु अंतोनी याद रहते हैं।जबकि आश्विन ककुमाणु और सामंथा रुथ के लिए जगह कम थी। दो दृश्यों में रमेश सिप्पी अच्छे लगे।और हाँ प्रतीक की बहन बनी अमृता ने भी कुछ दृश्यों में अपने अभिनय के प्रतीक बुनने की कोशिश की पर उनके पात्र को कुछ और विस्तार दिया जाना चाहिए था और विकास मेनन का भी।
निर्देशन : गौतम मेनन दक्षिण भारत के जाने-माने निर्देशक हैं और तमिल, तेलगु और हिंदी में फिल्म बना चुके हैं। अब गौतम मेनन अपनी ही तमिल विन्नईथन्डी वरुवाया को हिंदी में एक दीवाना था के नाम से लेकर मैदान मैं हैं। पिछले दिनों हमने जो हिंसक प्रेम कथाएँ देखी हैं उनके बाद एक दीवाना था और ऐसी ही हलकी फुलकी दूसरी प्रेम कथाओं वाली फिल्मों में ऐसे सीदे सादे पात्रों को देखना सुखद अहसास है। फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है लेकिन उसका व्याकरण और बुनाई नयी है। फिल्म में दो अलग अलग परिवेशों से आने वाले नायक नायिका हैं पर कोई भाषाई विवाद नहीं हैऔर न ही रिश्तों का गुज्नल ।बस है तो दोनों का खुद को एक दुसरे के लिए जरुरी होने के अर्थ को बताने की कवायद ।
दरअसल, फिल्म अपनी कहानी में जिस शिल्प और कथ्य को बुनती है निर्देशक ने उसका यथार्थवादी चित्रण भी किया है।फिल्म में बहुत जयादा पात्र नही हैं पर उनके विस्तार और प्रसंग करीने से व्याख्यित किया गए है। फिल्म की गति भी शुरू में धीमी है लेकिन उसके बाद जैसे जैसे कहानी आगे बढती है उसकी जिज्ञासा भी बढती जाती है। इसे भी मेनन का तकनीकी कौशल ही कहा जाएगा कि हर बार उनकी फिल्म हमें अपने कथानक के अंत का अहसास देती है पर फिर एक नयी शुरुआत और उम्मीद के साथ आगे बढ़ जाती है।यही इस फिल्म का असली आधार भी है।फिल्म में कई ऐसे प्रसंग है जो मार्मिकता और संवेदनशीलता के साथ रचे गए हैं।कई दृश्यों में नायक नायिका के भावुकता भरे दृश्य भाव्विहव्ल करते हैं और अंत में हम एक सुकून के साथ फिल्म को साथ साथ लिए बाहर आते हैं ।लेकिन इसके के लिए मनु ऋषि के संवाद, नीला हरा रंग, केरल के साथ मुम्बई का कैनवास,जावेद अख्तर की पटकथा, चुस्त सम्पादन और एम् एस प्रभु का कैमरा वर्क भी महत्वपूर्ण अवयव है।
फिल्म क्यों देखें : प्रेम के गुंजल के द्वन्द को दिखाने वाली एक अच्छी फिल्म है।
फिल्म क्यों ना देखें : ऐसा मैं नहीं कहूँगा।




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