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25-10-2014

दाल में कुछ काला है ‍[कॉमेडी]

रेटिंग - ५/२

दो टूक : कहते हैं किस्मत से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता। बस इतनी सी बात कहने की कोशिश करती है अभिनेता और निर्देशक आनंद बलराज की जैकी श्रॉफ, वीना मलिक, विजय राज,शक्ति कपूर, अमन वर्मा, राजा चौधरी,लिलीपुट,रज्जाक खान,बॉबी डार्लिंग और सोनिका गिल के अभिनय वाली फिल्म दाल में कुछ काला है।

कहानी : फिल्म की कहानी डब्बू [आनंद बलराज] नाम के ऐसे आदमी की है जिसे विरासत में कुछ पैसा मिल गया है। अकेले रहने वाले और आरामदायक जिंदगी daal mein kuch kaala haiजीने वाले दब्बू की महिलाएं कमजोरी है। एक दिन उसकी निगाह एक लड़की मलाई [वीना मलिक] पर जम जाती है जो हीरोइन बनाना चाहती है। उसे अपने जाल में फंसाने के लिए डब्बू रुपये लेकर उसके पास जाता है लेकिन वो नहीं जानता कि मलाई सिर्फ पैसा चाहती है और वो उसे उसे बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर बेवकूफ बना रही है।

डब्बू उस लड़की के साथ कार में दूसरे शहर के लिए रवाना होता है पर ड्राइवर चार्ली [विजय राज ] को दोनों पर शक होता है कि दाल में कुछ काला है। रास्ते में कुछ और लोग भी उन्हें शक की निगाह से देखते हैं और धीरे धीरे सबको पता चल जाता है कि बैग में रुपये भरे हैं। वे उनका पीछा करते हैं। अचानक बारिश की वजह से मलाई और डब्बू एक बंगले में रुकने का फैसला करते हैं। उनका पीछा कर रहे लोग भी उसी बंगले में रूक जाते हैं। यहीं से उनकी मुसीबत शुरू हो जाती है वो नहीं जानते कि उस बंगले में एक आत्मा [सुनैना सिंह] रहती है जो मलाई का रूप धारण कर दब्बू और उसके साथ कुछ और लोगों को अपने रहस्य में लपेट लेती है।

इसके बाद कहानी में जो घटनाएँ घटती हैं दाल में कुछ काला है उसकी की रोचक बानगी है। फिल्म में जैकी श्रौफ़, किशोर भानुशाली,राजा चौधरी, अली हसन,इरफ़ान मलिक, बॉबी डार्लिंग, अनिल नागरथ, लिलिपुट, वरुण बलराज, अमन वर्मा, रजाक खान, शेहजाद खान, सुदेश बेरी, सुनैना सिंह,जेनिफर परेरा, रमेश गोयल, हरम त्रिपाठी, हसीन मस्तना और मिर्जा की भी भूमिकाएँ हैं।


गीत-गीत : फिल्म में आब्फ्म का संगीत और नरेश,आनंद बलराज, नासिर के साथ विजय अकेला के गीत हैं लेकिन शीर्षक गीत के साथ ममता शर्मा के गए गीत मुंबई मनी है को छोड़ दिया जाये तो फिल्म का कोई भी गीत ऐसा नहीं जिसे याद रखा जाये।

अभिनय : फिल्म के केंद्र में आनंद बलराज हैं और उनके साथ वीना मलिक भी। लेकिन वीना मलिक को अभी बहुत जरुरत है हिंदी फिल्मों के लिए अभिनय के बिम्ब सीखने की।वो लाउड हैं और अतिरेकता की शिकार भी।आनंद राज केवल उबाते हैं। जबकि दो दर्जन भर जैकी,किशोर भानुशाली,राजा चौधरी, अली हसन, इरफ़ान मलिक, बॉबी डार्लिंग, अनिल नागरथ, लिलिपुट, वरुण बलराज, अमन वर्मा, रजाक खान, शहजाद खान, सुदेश बेरी, सोनिका गिल,जेनिफर परेरा, रमेश गोयल, हरेम त्रिपाठी, हसीन मस्ताना और मिर्जा सिर्फ इन दोनों के पीछे भागते रहे। हाँ कुछ दृश्यों में विजय राज और किशोर भानुशाली जरुर याद रहे।

निर्देशन : निर्देशक के पास अपनी बात कहने के लिए एक अच्छा विचार था पर वो कॉमेडी के फेर में उसे एक फार्मूला और औसत सी जाने पहचानी वाली फिल्म में बदल देते हैं। फिल्म की शुरुआत में हमें एक विषयक कॉमेडी फिल्म का अहसास वे जरुर देते हैं लेकिन मध्यांतर के बाद उसे उबाऊ और लचर घटनाओं में लपेट कर व्यर्थ कर देते हैं। फिल्म की लम्बाई जायदा है और दृश्य भी बहुत लम्बे। फिल्म रंगमंचीय शैली में बनी है और हरीश जोशी अपने कैमरे में उसे ठीक से रच नहीं सके।अगर इसकी पटकथा और सम्पादन पर कुछ और काम किया जाता तो ये शायद देखने वाली फिल्म बन जाती ।

फिल्म क्यों देखें : अगर कॉमेडी फ़िल्में पसनद हैं।

फिल्म क्यों नहीं देखें : कॉमेडी उबाऊ है।

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