माई फ्रेंड पिंटो [हिंदी ड्रामा]
- फिल्म समीक्षा
- शनिवार, 15 अक्टूबर 2011 16:13
- रामकिशोर पारचा
कहानी : फिल्म की कहानी बीस वर्षीय माइकल पिंटो [प्रतीक बब्बर] की है। गोवा के एक छोटे से गाँव में रहने वाला पिंटो सबको
अपनी तरह ही सरल, दयालु और ईमानदार समझता है। उसकी दुनिया उसकी मां उसके संगीत और अपने बचपन के दोस्त समीर [अर्जुन माथुर] की यादों के इर्दगिर्द घूमती है। समीर वर्षों पहले गोआ छोड़कर मुंबई रहने चला गया था। पर जब उसकी माँ की मौत हो जाती है और पिंटो समीर को ढूंढने के लिए जिस रात मुंबई पहुँचता है वो उसकी सोच और समझ को बदल देती है।वो समझ नहीं पता कि ये कौन सी दुनिया है जो उसे समीर ही नहीं बल्कि रिश्तों की दुनिया के भी कई नए चेहरों से परिचित करवा रही है। जिंदगी के कुछ ऐसे ही छिपे हुए चेहरों की कहानी है माई फ्रेंड पिंटो।
गीत संगीत : फिल्म में अमिताभ भट्टाचार्य और दीपा सेशाद्री के लिखे गीत और संगीत अजय गोगावाले, अतुल गोगावाले, शमीर टंडन ,कविता सेठ के साथ हितेश सोनिक का है। अब चूंकि ये फिल्म संजय लीला भंसाली का होम प्रोडक्शन है तो इसके गीत संगीत से कुछ तो आशा की ही जा सकती है।उनकी फिल्म गुजारिश नहीं चली पर उसका संगीत बुरा नहीं था। सो कुनाल और गायत्री गंजावाल के गाये टेक इट इजी ,के के का गाया यादों की अलबम और सुनिधि चौहान के साथ तू तू और विवान ,प्रनिल मोरे के साथ रंजना राजा के गाये गीत इन्तजार के बोल फिल्म की कहानी और उसके शिल्प के साथ संतुलन बना लेते हैं।
अभिनय : फिल्म का केंद्रबिंदु प्रतीक का चरित्र है पर वही इस पात्र की मानसिकता का निर्वाह नहीं कर पाती। हाँ, इस बार उनका पात्र उनकी संवाद अदायगी से जरुर मेल खा जाता है और शारीरक भाषा से भी। पर वे उसे पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाते। कल्कि अब हिंदी फिल्मों में जम गयी हैं और वे प्रतीक के साथ संतुलन बना लेती है।पर उन्हें और अधिक मेहनत की जरुरत थी। दिव्या दत्ता हमेशा की तरह निराश नहीं करती और अर्जुन माथुर प्रभावित करते हैं पर मकरंद देशपांडे के पात्र को सलीके से नहीं बुना गया। राज जुत्शी का लुक नया लगता है और उनके साथ आमीन हाजी और करीम जम जाते हैं जबकि श्रुति सेठ अतिरेकता का शिकार हो गयी ।
निर्देशन : माय फ्रेंड पिंटो संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन की फिल्म है और उनका फिल्मों में अपनी कहानी को चित्रित करने का अपना तरीका और शैली है । इस फिल्म में एक शानदार विषय उनके निर्देशक राघव डार के पास था। लेकिन तनाव भरी कहानी के साथ थ्रिलर रचना और हास्य के साथ प्रस्तुत करना चुनौती भरा है। फिल्म में घटनाक्रम रोचक अंदाज में बुना गया है और उसका विस्तार भी अद्भुत है पर फिल्म का नायक उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाता। इस मामले में हम सुधीर मिश्रा की फिल्म इस रात की सुबह नहीं को याद कर सकते हैं जिसे एक रात में गजब की थ्रिलर फिल्म की तरह प्रस्तुत किया गया था । पिंटो में इस तत्व को कामेडी के साथ मिला दिया गया है।पर वे ऐसी नहीं हैं कि हास्य पैदा कर सकें।फिर भी राघव की इस फिल्म को देखना बुरा नहीं लगेगा तो इसकी वजह है श्याम कौशल का एक्शन और शान मोहमद का सम्पादन । फिल्म के रंग गहरे धूसर और नीले हैं पर इन्हें उसके कथानक के साथ महसूस किया जा सकता है।
फिल्म क्यों देखें: अगर कॉमेडी थ्रिलर फ़िल्में पसंद हैं।
फिल्म क्यों न देखें: अगर प्रतीक से कोई शिकायत हो तो।





प्रेम भरोसा मांगता है। छल उसे कमजोर ही नहीं बनाता बल्कि उसे दूर भी कर देता है। सो निर्देशक अमित कसारिया की फिल्म आई डोंट लव यू भी ऐसे युवा दिलों की कहानी कहती है .
कहते हैं सपनों की कीमत अपनों से ज्यादा नही होती ..लेकिन कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपनों और रिश्तों को परवाह नहीं करते। औरंगजेब भी एक ऐसे ही साम्राज्य की कहानी कहती है.