अन्ना हजारे, सड़क पर उतरी युवा शक्ति और ओशो का नजरिया
- अध्यात्म-गंगा
- शुक्रवार, 19 अगस्त 2011 20:15
- ओशो
ओशो की भारत के जलते प्रश्न नामक पुस्तक में संग्रहीत उनके व्याख्यानों में भारत के कई ज्वलंत प्रश्नों का बेहद सारगर्भित दूरदृष्टिपूर्ण और तार्किक समाधान प्रस्तुत किया है। ओशो के संन्यासियों द्वारा भारत के भविष्य को लेकर पूछे जाने वाले विभिन्न प्रश्नों का ओशो ने जो जवाब दिये हैं वे आज अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान दिल्ली से लेकर देश के गाँव गाँव में सड़क पर उतरी युवा शक्ति की ताकत को एक नया अर्थ प्रदान करते हैं। आजसे से तीस चालीस साल पहले ओशो ने जो बात कही थी वह आज एकदम सही साबित हो रही है। प्रस्तुत है ओशो के प्रवचनों के मुख्य अंश।
एक मित्र ने पूछा है कि कहा जाता है कि भारत का जवान राह खो बैठा है। उसे सच्ची राह पर कैसे लाया जा सकता है?
पहली तो यह बात ही झूठ है कि भारत का जवान राह खो बैठा है। भारत का जवान राह नहीं खो बैठा है, भारत की बूढ़ी पीढ़ी की राह अचानक आकर व्यर्थ हो गयी है, और आगे कोई रास्ता नहीं है। आज तक जिसे हमने रास्ता समझा था वह अचानक समाप्त हो गया है, और आगे कोई रास्ता नहीं है। और रास्ता न हो तो खोने के सिवाय मार्ग क्या रह जाएगा?
भारत का जवान नहीं खो गया है, भारत ने अब तक जो रास्ता निर्मित किया था, इस सदी में आकर हमें पता चला कि वह रास्ता है ही नहीं। इसलिए हम बेराह खड़े हो गए हैं। रास्ता तो तब खोया जाता है जब रास्ता हो और रास्ते से भटक जाएँ। जब रास्ता ही न बचा हो तो किसी को भटकाने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जवान को रास्ते पर नहीं लाना है, रास्ता बनाना है। रास्ता नहीं है आज। और रास्ता बन जाए तो जवान सदा रास्ते पर आने को तैयार है, हमेशा तैयार है। क्योंकि जीना है उसे, रास्ते से भटककर जी थोड़े सकेगा! बूढ़े रास्ते से भटके, भटक सकते हैं। क्योंकि उन्हें जीना नहीं है। और सब रास्ते- भटके हुए रास्ते भी कब्र तक पहुँचा देते हैं।
लेकिन जिसे जीना है, वह भटक नहीं सकता। भटकना मजबूरी है उसकी। जीना है तो रास्ते पर होना पड़ेगा, क्योंकि भटके हुए रास्ते जिंदगी की मंजिल तक नहीं ले जा सकते हैं। जिंदगी की मंजिल तक पहुँचने के लिए ठीक रास्ता चाहिए, लेकिन रास्ता नहीं है।
मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि युवक नहीं भटक गया है, हमने जो रास्ता बनाया था वह रास्ता ही विलीन हो गया; वह रास्ता ही नहीं है अब। आगे कोई रास्ता ही नहीं है। और अगर युवक वर्ग को ही गाली दिए चले जाएँगे कि तुम भटक गए हो, तो वह हमसे सिर्फ क्रुद्ध हो सकता है क्योंकि उसे कोई रास्ता दिखायी नहीं पड़ रहा है और आप कहते हैं भटक गए हो।
हमने कुछ रास्ता बनाया था, जो बीसवीं सदी में आकर व्यर्थ हो गया है। हमने रास्ता बनाया था। वह रास्ता ऐसा था कि उसका व्यर्थ हो जाता अनिवार्य था।
पहली बात तो यह है कि हमने पृथ्वी पर चलने लायक रास्ता कभी नहीं बनाया। हमने रास्ता बनाया था, जैसे बेबीलोन में टावर बनाया था कुछ लोगों ने स्वर्ग जाने के लिए। वह जमीन पर नहीं था, वह ऊपर आकाश की तरफ जा रहा था। स्वर्ग पहुँचने के लिए कुछ लोगों ने एक टावर बनाया था।
हिंदुस्तान ने पाँच हजार सालों से जमीन पर चलने लायक रास्ता नहीं बनाया, स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजे हैं। स्वर्ग पर पहुँचने के रास्ते खोजने में पृथ्वी पर रास्ते बनान भूल गए हैं। हमारी आँखे आकाश की तरफ अटक गयी हैं। और हमारे पैर तो मजबूरी से पृथ्वी पर ही चलेंगे। बीसवीं सदी में आकर हमको अचानक पता चला है कि हमारी आँखों और पैरों में विरोध हो गया है। आँखें आकाश से वापस जमीन की तरफ लौटी हैं तो हम देखते हैं, नीचे कोई रास्ता नहीं है। नीचे हमने कभी देखा नहीं।
इस देश में हमने एक पारलौकिक संस्कृति बनाने की कोशिश की थी। बड़ा अदभुत सपना था, लेकिन सफल नहीं हुआ, न सफल हो सकता था। इस पृथ्वी पर रहने वाले को इस पृथ्वी की संस्कृति बनानी पड़ेगी, पार्थिव। इस पृथ्वी की संस्कृति हमने निर्मित नहीं की।
मैंन सुना है कि यूनान में एक बहुत बड़ा ज्योतिषी एक रात एक गड्डे में गिर गया। चिल्लाया है, बड़ी मुश्किल से पास की किसी किसान औरत ने उसे निकाला। जब निकाला है तब उस ज्योतिष ने कहा है कि माँ, तुझे बहुत धन्यवाद। मैं एक बहुत बड़ा ज्योतिषी हूँ, तारों के संबंध में मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता। अगर तुझे तारों के संबंध में कुछ जानना हो तो मैं बिना फीस के तुझे बता दूँगा, तू चली आना। मेरी फीस भी बहुत ज्यादा है।
उस बूढ़ी औरत ने कहा, बेटे तुम निश्चिंत रहो, मैं कभी न आऊँगी क्योंकि जिसे अभी जमीन के गड्डे नहीं दिखायी पड़ते हैं उसके आकाश के तारों के ज्ञान का भरोसा मैं कैसे करूँ?
भारत कोई तीन हजार साल से गड्डे में पड़ा है आकाश की तरफ आँखे उठाने के कारण। नहीं, मैं यह नहीं कहता हूँ कि किन्हीं क्षणों में आकाश की तरफ न देखा जाए, लेकिन आकाश की तरफ देखने में समर्थ वहीं है जो जमीन पर रास्ता बना ले और विश्राम कर सके। वह आकाश की तरफ देख सकता है। लेकिन जमीन को भूलकर अगर आकाश की तरफ देखेंगे तो गहरी खाई में गिरने के सिवाय कोई मार्ग नहीं है।
लेकिन पूछा जा सकता है कि भारत के जवान ने इसके पहले यह भटकन क्यों न ली? बीसवी सदी में आकर क्या बात हो गयी? रास्ता- मैं कह रहा हूँ, तीन हजार साल से हमारी पूरी संस्कृति ने जमीन पर रास्ता ही नहीं बनाया।
अगर हम पुराने शास्त्र पढ़े तो उनमें हमें मिल जायेंगी किताबें, जिनका नाम है, 'मक्षमार्ग', मोक्ष की तरफ जाने वाला रास्ता। लेकिन पृथ्वी पर चलने वाले रास्ते के संबंध में एक किताब भारतीय संस्कृति के संबंध में नहीं है। स्वर्ग जाने का रास्ता भी है, नर्क जाने का रास्ता भी है, लेकिन पृथ्वी पर चलने के रास्ते के संबंध में कोई बात नहीं है।
ये क्रांति अब खभी खत्म नहीं होगी
अतीत के इतिहास में क्रांतियाँ होती थीं और समाप्त हो जाती थीं। लेकिन आज हम सतत क्रांति में जी रहे हैं। अब क्रांति कभी समाप्त नहीं होगी। पहले क्रांति एक घटना थी, अब क्रांति जीवन है। पहले क्रांति शुरू होती थी और समाप्त होती थी। अब क्रांति शुरू हो गयी और समाप्त नहीं होगी। अब आने वाले भविष्य में मनुष्य को सतत क्रांति और परिर्वन में ही रहना होगा। यह एक इतना बड़ा नया तथ्यं है, जिसे स्वीकार करने में समय लगना स्वाभाविक है।
यदि हम सौ वर्ष पहले की दुनिया को देखें, तो कोई दस हजार वर्ष के लंबे इतिहास में आदमी एक जैसा था, वैसा ही था। समाज के निय वहीं थे, जीवन के मूल्य वहीं थे, नीति और धर्म का आधार वहीं था। दस हजार वर्षों में मनुष्य की जिंदगी के आधारों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इस सदी में आकर सारे आधार हिल गए हैं और सारी भूमि हिल गई है। जैसे एक ज्वालामुखी फूट पड़ा हो मनुष्य ने नीचे अरौ सब परिवर्तन हम समाप्त कर देंगे। यह परिवर्तन जारी रहेगा और रोज ज्यादा होता चला जायेगा।
अब तक हमने जिस मनुष्य को निर्मित किया था वह एक स्थायी, सुस्थिर समाज का नागरिक था। अब जिस मनुष्य को हमें निर्मित करना है, वह सतत क्रांति का नागरिक हो सके, इसका ध्यान रखना जरूरी है। भविष्य के मनुष्य की रूपरेखा, या नए मनुष्य के संबंध में सोचते समय पहली बात यह सोच लेनी जरूरी है कि परिर्वतन के जगत में जहाँ रोज सब बदल जायेगा- हम कैसे नीति विकसित करें, हम कैसा आचरण विकसित करें, मनुष्य को फिर से पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है। महावीर ने, बुद्ध ने, मनु ने, कृष्ण ने और क्राइस्ट ने हमें मनुष्य की जो रूपरेखा दी थी, वह रूपरेखा आज आउट-ऑफ-डेट हो गयी है, समय के बाहर हो गयी है। उसी रूपरेखा को अगर लेकर हम चलते हैं तो अब जिंदगी ढंग की नहीं हो सकती।
इसलिए पहली बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह, कि अब तक के सारे आदर्श और सारे मूल्य जिस भांति जिस ढाँचे में विकसित किये गये थे, वे भविष्य के मनुष्य के काम के नहीं रह गये हैं। अब तक हमनें जिस मनुष्य को बनाने की कोशिश की थी वह भय के ऊपर खड़ा था। नर्क का भय, स्वर्ग का प्रलोभन था। और भय और प्रलोभन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
मनुष्य बुरा न करे, इसलिए नर्क के भय से हमने पीड़ित किया था और मनुष्य अच्छा कर सके, इसलिए स्वर्ग के प्रलोभन दिए थे। लेकिन आज अचानक इस सदी में आकर स्वर्ग और नर्क दोनों ही विलीन हो गये। उनके साथ ही वह नैतिकता भी विलीन हुई जा रही है जो भय और प्रलोभन पर खड़ी थी। आज जो अनैतिकता का सारे जगत में विस्फोट हुआ है, उसका कोई और कारण नहीं है। पुरानी नीति के आधार गिर गये हैं।
मैंने सुना है, एक चर्च के स्कूल में एक पादरी बच्चों को नीति की शिक्षा देने आता था। उसने बच्चों को नैतिक साहस के संबंध में छोटी-सी कहानी कहीं, मारल करेज के लिए। उसने बच्चों को समझाने के लिए कहा कि नैतिक साहस मनुष्य के जीवन में बड़ी जरूरी चीज है। वह कहानी बड़ी पुरानी थी।
उसने उन बच्चों से कहा कि मैं तुम्हें एक छोटी-सी-कहानी से समझाऊँ- तीस बच्चे किसी पर्वत पर घूमने के लिए गए। वे दिनभर में थक गये हैं। रात सोने के समय सर्द रात है, ठंड लग रही है, बिस्तर तैयार है। उन्तीस बच्चे सो गये, लेकिन एक बच्चा अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना करने के लिए अंधेरे कोने में ठंड से सिकुड़ा हुआ बैठा है। तो उस पादरी ने बच्चों को कहा कि वह जो एक है, उसमें बड़ा नैतिक साहस है उन्तीस के विरोध में जाने का। जबकि ठंड बिस्तर में बुला रही हैं और दिनभर की थाकान है। और जब उन्तीस लोग सो गये हैं, तब भी एक बच्चा अपनी रात्रि की अंतिम प्रार्थना पूरा किये बिना नहीं सोता है, उसमें बड़ा नैतिक साहस है।
वह (पादरी) सात दिन बाद वापस आया। उसने बच्चों से पूछा, मैंने नैतिक साहस की तुम्हें कहानी सुनायी थी। मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ, तुम समझ सके मेरी बात? क्या तुम भी मुझे कोई घटना सुनाओगे जो नैतिक साहस को बताती हो? एक बच्चा खड़ा हुआ। यह बच्चा बीसवीं सदी के पहले कभी खड़ा नहीं हो सकता था। एक बच्चे ने खड़े होकर कहा कि हमने भी एक कहानी सोची है और आपकी बात से उसमें नैतिक साहस ज्यादा है। उस चर्च के पादरी ने कहा, 'मैं सुनना चाहूँगा।'
उस बच्चे ने कहा, 'आप जैसे तीस पादरी पहाड़ी पर गये हुए थे घूमने, भ्रमण करने। वे दिनभर थके-मांदे वापस लौटे। रात सर्द है, ठंडी है। बिस्तर उन्हें पुकार रहे हैं, लेकिन उन्तीस पादरी प्रार्थना करने बैठ गए हैं, और एक पादरी सोने चला गया है। और उस एक पादरी में बहुत नैतिक साहस है, उन्तीस पादरियों के विरोध में जाने का।'
यह बीसवीं सदी से पहले किसी बच्चे ने न सोचा होगा। और यह बात सच है। जब उन्तीस लोग प्रार्थना कर रहे हों और उनकी आँखे यह कह रही हों कि जो प्रार्थना नहीं करेगा वह नर्क भेज दिया जायेगा, और उनके सारे व्यक्तित्व का सुझाव यह कह रहा हो, उनके गैस्चर, उनकी मुद्राएँ यह कह रही हों कि नर्क में सड़ोगे, तब एक आदमी का प्रार्थना छोड़कर नींद के लिए बिस्तर पर चले जाना बहुत हिम्मत की बात है।
लेकिन यह हिम्मत आज की जा सकती है, क्योंकि नर्क और स्वर्ग हवाई कल्पनाओं से ज्यादा नहीं रह गये हैं। लेकिन आज से कुछ सदियों पूर्व वे बड़ी सच्चाइयाँ थीं। और आदमी उन्हीं से भयभीत होकर जी रहा था। तो हमने आदमी को कहा था कि झूठ बोलोगे तो नर्क में पड़ोगे, सत्य बोलोगे तो स्वर्ग में सुख मिलेगा। हमने बहुत प्रलोभन दिये थे। आदमी डरा हुआ था। तो वह नीति को मानकर जी रहा था। लेकिन आज सारे भय गिर गये हैं। आदमी निर्भय हुआ है। इस निर्भय आदमी पर पुरानी नीति लागू नहीं हो सकती। पुरानी नीति भी पुराने आदमी के साथ मर गयी है, मर रही है, मर जायेगी।
लेकिन क्या मनुष्य को अनीति में छोड़ देना है? क्या मनुष्य के अभय और निर्भय होने का अर्थ यह होगा कि वह अनैतिक हो? अगर यह होगा तो समाज निरंतर गहरे खतरों में पड़ जायेगा। क्योंकि नैतिक होने का एक ही अर्थ है कि मैं दूसरे व्यक्ति की भी चिंता करता हूँ, मैं अकेला नहीं हूँ। मैं अकेला नहीं हूँ! मैं इस पृथ्वी पर साथियों के साथ हूँ। कोई भी अकेला नहीं है। हमारे चारों तरफ पड़ोसियों का बड़ा जाल है और मैं पड़ोसी के लिए भी दायित्वपूर्ण हूँ। मैं उसके लिए भी विचार करता हूँ। उसे दुःख न पहुँचे, इस भांति जीता हूँ। नैतिकता का आधार इतना है, लेकिन अब तक हमने भय के आधार पर इस बात को संभाले रखा था। कानून का भय था, पुलिस वाला खड़ा है चौराहे पर। आदालत में मजिस्ट्रेट बैठा है। ऊपर भगवान बैठा है। वह सुप्रीम कांस्टेबल का काम करता रहा है अब तक। बड़े से बड़ा पुलिस का हवलदार था। वह ऊपर से बैठकर नियंत्रण कर रहा है, लोगों को नर्क भेज रहा है, स्वर्ग भेज रहा है। लेकिन वह सब विदा हो गया है।
बीसवीं सदी की खोज ने बताया कि भगवान भी हमने अपने भय से निर्मित कर लिया था और उस भगवान का तो हमें कोई भी पता नहीं है, जो है। और जिस भगवान को हमने निर्मित कर लिया था, वह हमारे भय का ही आधार था। वह भगवान भी धीरे-धीरे फैड-आउट हो गया है। वह भी विलीन हो गया है। उसके साथ उसके नर्क-स्वर्ग भी विलीन हो गये हैं। उसके पुरोहित-पंडे, वे भी सब विलीन हो गये हैं। आदमी एकदम वैक्यूम में, खाली जगह खड़ा हो गया है। अब हम उसे डराकर नैतिक नहीं बना सकते।
....पुराना आदमी नैतिक था बुद्धि खोकर। और बुद्धि को खोकर नैतिक होना अनैतिक होने से भी बदतर है। पुराना आदमी नैतिक था व्यक्तित्व खोकर। और व्यक्तित्व को खोकर नैतिक होना अनैतिक होने से भी बुरा है। पुराने आदमी के पास कोई व्यक्तित्व, कोई इंडीवीजुअलिटी न थी, यह भी ध्यान में रख लेना जरूरी है। पुराना आदमी समूह का एक अंग था, व्यक्ति नहीं। गाँव में एक आदमी था, वह समूह का एक अंग था, उसके पास कोई व्यक्तित्व न था। वह अलग से कुछ भी न था। वह भंगी था, ब्राह्मण था, चमार था, बनिया था, एक समूह का हिस्सा था और समूह के ऊपर जिंदा था। वह समूह के खिलाफ इंचभर चलता तो कुएँ पर पानी पीना बंद था, हुक्का बंद था, भोजन बंद था, विवाह बंद था। वह जिंदा नहीं रह सकता था।....
....हिंदुस्तान से एक आदमी जर्मनी लौटा- काउंट कैसरलिन, तो उसने अपनी डायरी में लिखा कि हिंदुस्तान में जाकर मुझे पहली दफा पता चला कि स्वास्थ्य एक अनैतिकता है, बीमार होना नैतिकता है। और हिंदुस्तान में जाकर मुझे पता चला कि अस्वच्छ रहना, गंदगी से रहना अध्यात्म है। स्वच्छ रहना और ताजे रहना, साफ-सुधरे रहना भौतिकवाद है, मैटीरियलिज्म है।
नहीं, यह सब हमें बदल देना पड़ेगा। एक नयी नीति- स्वस्थ, सुखी आदमी को, मुस्कराते आदमी को स्वीकार करेगी। हमें बुद्ध और महावीर की नयी मूर्तियाँ ढालनी होंगी, जिनमें वे खिलखिलाकर हंस रहे हों। अब उदास महावीर और उदास बुद्ध नहीं चल सकते हैं। ईसाई तो कहते हैं कि जीसस कभी हँसे ही नहीं क्योंकि हँसने जैसी छोटी-ओछी चीज जीसस कर सकते थे! उनकी किताबें कहती हैं, 'जीसस नैवर लाफ्ड'- हँसे ही नहीं कभी जिंदगी में। तो उन्होंने जीसस को जैसा बनाया..देखा होगा सूली पर लटके हुए। अगर वे न भी लटकाते तो ईसाई उनको लटता देते, क्योंकि गंभीर आदमी को सूली पर लटका होना चाहिए। लेकिन अब हम जीसस को हँसाकर रहेंगे। हमें जीसस की नयी तस्वीरें बनानी पड़ेंगी, जिसमें वे हँस रहा हों, फूल के बगीचे में खड़े हों।
नये आदमी को सुखी और स्वस्थ्य और आनंदित- इस पृथ्वी पर, स्वर्ग में नहीं, इस पृथ्वीत पर सुख और स्वास्थ्य को स्वीकार करना पड़ेगा तो हम एक विधायक नीति के आधार रख सकते हैं। मुझे कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता कि ये आधार क्यों नहीं रखे जा सकते हैं। मैं आपसे इतनी ही प्रार्थना करूँगा, इन दिशाओं में सोचें। बड़ा सवाल है, जिंदगी के सामने बड़ी समस्या है कि नयी नीति को कैसे जन्म दें। इन दिशाओं में सोचें। शायद हम सब सोचें तो हम कुछ रास्ते खोज लें।
मैं कोई उपदेश देनेवाला नहीं हूँ कि आपको उपदेश दूँ और आप ग्रहण कर लें। वह मामला छोड़ें, वह गुरु-शिष्य का संबंध गया। अब कोई उपदेश देगा, कोई ग्रहण करेगा, यह सवाल नहीं है। हम सब इकट्ठे होकर सोच सकें, हम सब मित्र की तरह साथ सोच सकें, और नये मनुष्य की रूपरेखा निर्मित कर सकें, इस दिशा में मैंने कुछ बातें कहीं। मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुग्रहीत हूँ और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूँ, मेरे प्रणाम स्वीकार करें!
साभार : भारत के जलते प्रश्न (स्वर्ण पाखी था जो कभी और अब है भिखारी जगत का)
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन





प्रेम भरोसा मांगता है। छल उसे कमजोर ही नहीं बनाता बल्कि उसे दूर भी कर देता है। सो निर्देशक अमित कसारिया की फिल्म आई डोंट लव यू भी ऐसे युवा दिलों की कहानी कहती है .
कहते हैं सपनों की कीमत अपनों से ज्यादा नही होती ..लेकिन कुछ लोग अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपनों और रिश्तों को परवाह नहीं करते। औरंगजेब भी एक ऐसे ही साम्राज्य की कहानी कहती है.