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नर्मदा घाटी के प्राचीनतम रहस्यों का पिटारा खुला!

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नर्मदा घाटी धरती की प्राचीनतम नदी घाटियों में से एक है। यहाँ करोड़ों वर्ष पहले की दुनिया आज की दुनिया से बहुत भिन्ना थी। यह तब की बात है जबकि हिमालय पर्वत का निर्माण भी नहीं हुआ था, लेकिन विंध्य और सतपुड़ा पर्वत मौजूद थे। उस समय अरब सागर नेमावर के आस-पास तक एक पतली शाखा के रूप में भीतर घुसा हुआ था। तब यहाँ समुद्री जीव-जंतुओं की भरमार हुआ करती थी। उस काल में यहाँ छोटे-बड़े असंख्य डायनासोर विचरण किया करते थे और गगनचुंबी वृक्षों से भरे हुए जंगल अभेद्य थे। फिर धीरे-धीरे करोड़ों बरसों में जलवायु और जैव विविधता में हुए अनेक बदलावों के कारण नर्मदा घाटी ने अपना आज का स्वरूप ग्रहण किया। यहाँ के जीव-जंतु बदले, वनस्पतियाँ बदलीं और अंततः मानव का विकास हुआ। नर्मदा के सुदूर अतीत के रहस्यों का यह पिटारा हाल ही में प्रकाशित एक ग्रंथ "प्रकृति के रहस्य खोलते नर्मदा घाटी के जीवाश्म" से हुआ है।

नर्मदा घाटी के विभिन्ना भागों से समय-समय पर खोजे गए जीवाश्मों पर हुए वैज्ञानिक शोध पर आधारित यह ग्रंथ नर्मदा के इतिहास पर एक नई दृष्टि डालने का अवसर देता है। यह आश्चर्यजनक, किंतु सत्य है कि नर्मदा घाटी में कभी महागज-स्टेगोडॉन, शुतुरमुर्ग, हिप्पोपोटेमस आदि जीव रहा करते थे, जो आज भारत में ही नहीं पाए जाते हैं। इसी प्रकार नीलगिरी या यूकेलिप्टस का वृक्ष जिसे हम ऑस्ट्रेलिया से आया विदेशी वृक्ष समझते हैं, लाखों वर्ष पहले डिंडौरी- मंडला के निकट घुघवा में पाया जाता था। जबलपुर में डायनासोर का पहला जीवाश्म तभी खोजा जा चुका था, जब डायनासोर शब्द प्रचलन में भी नहीं था। धार जिले में बाग के निकट पाडल्या वनग्राम में डायनासोर के १०० से अधिक अंडों के जीवाश्म हाल ही में मिले हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि स्टीवन स्पिलबर्ग की प्रसिद्ध फिल्म जूरासिक पार्क में दिखाए गए भयानक टी-रेवस डायनासोर जैसा मांसाहारी विध्वंसक डायनासोर कभी भरूच से लेकर जबलपुर तक एकछत्र राज किया करता था। वैज्ञानिकों ने इसे नर्मदा घाटी का राजसी डायनासोर कहते हुए इसका नाम राजासॉरस नर्मदेन्सिस किया है। इसके अतिरिक्त भी नर्मदा घाटी से शाकाहारी और मांसाहारी डायनासोरों की कई प्रजातियों की पहचान वैज्ञानिकों द्वारा की गई है।

नरसिंहपुर जिले में नर्मदा व इसकी सहायक शेर नदी के आसपास तो विलुप्त वन्य-प्राणियों के इतने जीवाश्म मिले हैं कि इस क्षेत्र को जीवाश्मों का खजाना ही कहा जा सकता है। यहाँ से कृष्णमृग, सांभर, गौर, हिप्पोपोटेमस, तेंदुए जैसे अनेक वन्य-प्राणियों के जीवाश्म मिलने से लगता है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक स्वर्ग था। इसी तरह सीहोर जिले के नर्मदा तटीय गाँव हथनौरा में लगभग पाँच लाख साल पुराने नर्मदा मानव का जीवाश्म मिलना मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खोज से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

नर्मदा घाटी के जीवाश्मों का संरक्षण जरूरी : दुर्भाग्य की बात है कि कानूनी संरक्षण के अभाव में नर्मदा घाटी की मूल्यवान जीवाश्म संपदा लुट रही है। पुरातत्व विभाग पाँच-छः हजार साल पुरानी धरोहरों की चिंता तो करता है, परंतु करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्म उसकी कार्यसूची में नहीं आते। वन विभाग इस बारे में थोड़ी-बहुत कार्यवाही ही कर पाता है। जीवाश्मों की तस्करी करके बाहर ले जाने और सीमेंट की फैक्टरियों में पीसे जाने से क्षति की घटनाएँ निरंतर होती रहती हैं, परंतु जीवाश्म संरक्षण का कोई विशिष्ट कानून न होने से जीवाश्म तस्करों पर प्रभावी कार्यवाही संभव नहीं हो पाती।

(लेखक मुख्य वन संरक्षक कार्य आयोजना, इंदौर हैं)

साभार-नईदुनिया से

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