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अध्यात्म-गंगा
पाठकों के लगातार सुझाव और माँग पर हम से ये नया पृष्ठ शुरु कर रहे हैं। इस पृष्ठ पर हम अपने देश के सिध्द पुरुषों, संतों, ज्ञानियों और संबुध्दि के शिखर को छूने वाले संबुध्दों के वचनों को स्थान देंगे। अगर आपके पास किसी ध्यानी, संत या संबोधि प्राप्त किसी संबुध्द के कीमती वचन हों तो आप भी उन्हें हमें भेज सकते हैं। इस कड़ी में प्रस्तुत है इस सदी के क्रांतिकारी सद्गुरू ओशो के प्रवचनों के कुछ अंश।

मृत्यु ही जीवन हैः ओशो छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
  
अध्यात्म-गंगा |   मीडिया डेस्क |  शुक्रवार , 03 सितम्बर 2010
osho-0.jpgजीवन का और मृत्यु जैसी कोई चीज ही नहीं है। जीवन ज्ञात होता है, तो जीवन रह जाता है। और जीवन ज्ञात नहीं होता, तो सिर्फ मृत्यु रह जाती है। मनुष्य मृत्यु नहीं है, मनु्ष्य अमृत है।

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टीवी की खबरें देखकर कृष्ण और राधा को नहीं जान सकते ! छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
  
अध्यात्म-गंगा |   ओशो |  शुक्रवार , 26 मार्च 2010
osho07.jpgसबसे बड़ा कारण तो यह है की कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊँचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है।

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जो चमत्कार दिखाए वो संत नहीं पाखण्डी है! छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 4
  
अध्यात्म-गंगा |   ओशो |  मंगलवार , 23 मार्च 2010
osho-laughing.jpgचमत्कार शब्द का हम प्रयोग करते हैं, तो साधु-संतों का खयाल आता है। अच्छा होता कि पूछा होता कि मदारियों के संबंध में आपका क्या खयाल है? दो तरह के मदारी हैं- एक, जो ‍ठीक ढंग से मदारी हैं, 'आनेस्ट'। वे सड़क के चौराहों पर चमत्कार दिखाते हैं।

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यह शिक्षा हमें भिखारी बनाती है, स्वावलंबी और स्वाभिमानी नहीं! छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
  
अध्यात्म-गंगा |   ओशो |  सोमवार , 15 मार्च 2010
osho1029_copy.jpgजीवन मिलता नहीं है, निर्मित करना होता है।
जन्म मिलता है, जीवन निर्मित करना होता है।

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जीवन का लक्ष्य क्या है? छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 1
  
अध्यात्म-गंगा |   ओशो |  गुरुवार , 11 मार्च 2010
जीवन के तथाकथित सुखों की क्षणभंगुरता को देखो। उसका दर्शन ही, उनसे मुक्ति बन जाता है। किसी ने कोई लोक कथा सुनाई थी- एक चिडि़या आकाश में मंडरा रही थी। उसके ऊपर ही दूर पर चमकता हुआ एक शुभ्र बादल था।

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महिला आरक्षण पर ओशो का नजरिया छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 2
  
अध्यात्म-गंगा |   ओशो |  बुधवार , 10 मार्च 2010
osho07.jpgबुनियादी भूल जो सारी शिक्षा और सारी सभ्यता को खाए जा रही है, वह यह है कि अब तक के जीवन का सारा निर्माण पुरुष के आसपास हुआ है, स्त्री के आसपास नहीं।

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