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| पेटेंट की लड़ाई में भारत को मिला 'ब्रह्मास्त्र' |
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| भारत-गौरव | सुरेश उपाध्याय | बुधवार , 28 जुलाई 2010 | |
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अगर हमारे इडली-डोसा, पुदीने की चटनी या फिर लिट्टी को कोई चाइनीज, अमेरिकी या ब्रिटिश फर्म पेटेंट करा ले तो क्या हो? आप कह सकते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन ऐसा कभी भी हो सकता है। बाजार का गणित कुछ भी करा सकता है। यही वजह है कि अब भारत सरकार हमारे परंपरागत व्यंजनों, कलाओं और संस्कृति को पेटेंट की जंग से बचाने की कवायद में जुट गई है। हमारे परंपरागत औषधि विज्ञान को विदेशी नजरों से बचाने में निर्णायक लड़ाई लड़ रही वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की ट्रडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) अब हमारे परंपरागत व्यंजनों, कला, शिल्प और संगीत को संरक्षित करने की मुहिम छेड़ने जा रही है। डिजिटल डेटाबेस में इडली डोसा से पेंटिंग्स तक टीकेडीएल के डाइरेक्टर वी. के. गुप्ता बताते हैं कि इसके लिए एक डिजिटल डेटा बेस बनाया जाएगा। इसमें संबद्ध विषय की पूरी जानकारी मुहैया कराई जाएगी। मिसाल के तौर पर इडली-डोसा या फिर मधुबनी पेंटिंग्स को ही लें तो बताया जाएगा कि भारत में इन्हें कब से और कैसे बनाया जा रहा है व इनमें किन-किन सामग्रियों का इस्तेमाल होता है। फिर इस डेटा बेस को दुनिया के तमाम पेटेंट आफिसों को मुहैया करा दिया जाएगा, ताकि हमारी विरासत की ओर कोई आंख उठाकर भी न देख सके। पेटेंट की जंग में भारत का ब्रह्मास्त्र असल में पेटेंट की जंग में टीकेडीएल भारत का ब्रह्मास्त्र है। लेकिन इस ब्रह्मास्त्र को तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। भारत सरकार के आयुष विभाग के सहयोग से सन् 2001 में जब इस पर काम शुरू हुआ तो समस्या थी कि आयुर्वेद, यूनानी और सिद्ध (तमिल चिकित्सा पद्धति) के संस्कृत, उर्दू, फारसी और तमिल में लिखे हजारों ग्रंथों का अंग्रेजी और दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद कैसे हो। इसके लिए हजारों अनुवादकों की जरूरत पड़ती और न जाने कितने साल का समय लग जाता। इस दौरान हमारे कई परंपरागत पेड़-पौधे और नुस्खे हाथ से जो निकल जाते, सो अलग। परंपरा को तकनीक का सहारा इस विकट समस्या से निपटने के लिए टीकेडीएल के निदेशक और आईटी विशेषज्ञ वी. के. गुप्ता ने खुद एक सॉफ्टवेयर का विकास किया। इसमें संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू और तमिल भाषा के शब्दों के लिए प्रतीक (सिंबल) बनाए गए। इन प्रतीकों से हर भाषा के लिए एक नई लिपि रची गई। यह काम बेहद मेहनत का था और यह मेहनत रंग लाई। वी. के. गुप्ता बताते हैं कि आज इस सॉफ्टवेयर की मदद से संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू और तमिल की प्राचीन पांडुलिपियों का पलक झपकते ही अंग्रेजी, फ्रेंच, चीनी, जापानी, स्पैनिश और जर्मन भाषा में अनुवाद हो जाता है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय यूनियन के पेटेंट ऑफिसों को इस सॉफ्टवेयर को एक्सेस करने की इजाजत दी गई है। इसका फायदा यह हो रहा है कि इन देशों में यदि कोई भारत के परंपरागत नुस्खों को चुराकर पेटेंट कराने की कोशिश कर रहा हो तो वह पकड़ में आ जाता है। इससे भारत की मेहनत, परंपरा और पैसा तीनों ही बच रहे हैं। साभार-दैनिक नवभारत टाईम्स से Related items
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