Login
हमारे मित्र
आज के लोकप्रिय लेख
- क्या आपको पता है कि दुनिया में हर वक्त गूंजने वाली आवाज़ कौन सी है ?
- ब्रिटेन में दूसरा हिन्दू स्कूल शीघ्र खुलेगा
- आईपीएल से बाहर होंगी शिल्पा और प्रीटि ज़िंटा
- क्यों लाचार हैं हम चीन और पाकिस्तान के आगे?
- आज पाँच बजे होगा अंकों का चमत्कार
- विदेशी लेखकों की भारतीय धर्मग्रंथों का अपमान करने की कुत्सित मानसिकता
- तस्लीमा नसरीन के सिर पर इनाम रखने वाले के खिलाफ मामला
- बंगलादेश ने हड़प ली हमारी 685 एकड़ भूमि
- पाकिस्तान के लिए भारत में काटे जाते हैं लाखों पशु
सर्वाधिक लोकप्रिय लेख
- कौन थे गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक
- ये हैं भारत के असली वैज्ञानिक
- मैं पाकिस्तान बोल रहा हूँ
- ओम जय जगदीश की आरती के रचयिता
- चमत्कारी और तिलस्मी है वैदिक गणित
- आजाद होते ही देश को गिरवी रख दिया
- पाकिस्तान में हिन्दू होना अभिशाप हो गया
- विदेशों में भी गूंजी भारत माता की आरती
- एक चैनल को 'ऐसे' पत्रकार चाहिए
- भारतीय पध्दति से जन्मदिन कैसे मनाएं
- वंदे मातरम् का इतिहास
- वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी
- आने वाले दिनों के लाईव कवरेज
- एक पाकिस्तानी पत्रकार की पीड़ा
आपकी राय
| गेस्ट बुक में अपनी राय दें |
हिन्दी सहायता
| हिन्दी लिखें |
| हिन्दी कैसे लिखें |
| हिन्दी लिखो-ईनाम पाओ |
| ब्लॉग कैसे बनाएं |
| ई-शिक्षक |
| News Letter |
| माय पॉपकॉर्न |
| ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक कहना शहीदों का अपमान है |
|
|
| विशेष | मनोज श्रीवास्तव | सोमवार , 18 अगस्त 2008 | |
|
हमारे कई पाठकों ने वंदे मातरम् गीत के बारे में जानना चाहा है कि इसका इतिहास क्या है और यह पूरा गीत कहाँ उपलब्ध होगा। हम यहाँ पूरा गीत उपलब्ध करा रहे हैं, साथ ही यह भी बता देना चाहते हैं कि इस गीत को पूरा गाने पर इसलिए रोक लगा दी थी कि कतिपय राष्ट्रविरोधी ताकतों को यह गीत अधार्मिक और उनकी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ लग रहा था। इस गीत में लाल रंग में दी गई पंक्तियों को राष्ट्र विरोधी मान लिया गया था, अब यह आप ही फैसला करें कि इन पंक्तियों में ऐसा क्या है जिसके गाने से देश की एकता और अखंडता को हानि पहुँच रही थी। इस देश में जब तक ऐसी सरकारें मौजूद रहेगी, जो राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत गीत को ही राष्ट्र विरोधी मानेगी तो फिर इस देश को आतंकवाद और राष्ट्र विरोधी शक्तियों से कोई नहीं बचा सकता। इस विषय पर मध्य प्रदेश के जन संपर्क आयुक्त एवं वरिष्ठ आयएएस अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव का एक खोजपरक लेख भी हमें मिला है, जिसमें उन्होंने दुनिया भर के कई देशों के राष्ट्रीय गीतों के इतिहास के साथ ही वंदे मातरम् के इतिहास. आज़ादी के पहले से लेकर आज़ादी के बाद तक की इसकी यात्रा और इसके विभिन्न आयामों को प्रामाणिक तथ्यों के साथ सामने लाने की कोशिश की है। हिन्दी में वंदे मातरम् पर इससे बेहतरीन लेख इंटरनेट पर कहीं उपलब्ध नहीं है। हम अपने पाठकों के लिए यह लेख भी साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। आज देश को मनोज श्रीवास्तव जैसे आयएएस अधिकारियों की जरुरत है जो अपनी भाषा में राष्ट्रीय हित से जु़ड़े मुद्दों पर चिंतन ही नहीं करते हैं बल्कि उस पर बेबाकी से अपनी कलम भी चलाते हैं।
राजेन्द्र यादव जो ‘वरिष्ठ साहित्यकार और मासिक पत्रिका ‘हंस के संपादक हैं, का कहना है कि ‘उनकी यह राष्ट्र वंदना बहुत ही सांप्रदायिक और संकीर्ण मानसिकता वाली है। ऐसी ही मातृभूमि की कल्पना वंदे मातरम् में की गई है जो म्लेच्छों से खाली होगी। इसे नहीं मंजूर किया जा सकता है।
दिक्कत यह है कि वंदे मातरम् गाना जिस उपन्यास से लिया गया है, वह मुसलमानों के खिलाफ़ है और अंग्रेजों के भी। इस उपन्यास और इस गाने में अपनी मातृभूमि को म्लेच्छों से खाली कराने का आव्हान किया गया है। यहा म्लेच्छों का संदर्भ बिल्कुल स्पष्ट है। मुसलमानों को म्लेच्छ माना गया है। इस लिहाज से यह बहुत सांप्रदायिक ढंग का गाना है, जिसे नह गाया जाना चाहिए।
यादव की यह टिप्पणी विचारहीनता और तर्कहीनता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व तो करती ही है, तथ्यहीनता को भी स्पष्ट करती है। महोदय ने वंदे मातरम् को पूरा-पूरा पढा भी नह है, यह उनकी इस टीप में कट तथ्य संबंधी त्रुटियों से ही स्पष्ट है। इनमें कहाँ हैं म्लेच्छ और उनसे मातृभूमि को खाली कराने के उद्गार? यह एक विडंबना ही है कि एक गीत जो औपनिवेशिक शोषण और गुलामी के विरुद्ध सारे भारतीयों को जोड़ने का मूलमंत्र बना, समकालीन स्वतंत्र भारत में ‘भड़काने और विभाजित करने के आरोप का शिकार हो रहा है। इस गीत में कौन सी ‘नकारात्मकता है? जिन कोटि-कोटि कंठ के कलकल निनाद की बात इस गीत में कही गई है क्या उसमें कोई जातीय या सांप्रदायिक सोच दिखाई देता है? जिन कोटि-कोटि भुजाओं की बात इसमें कही गई है क्या उसमें सिर्फ हिंदुओं की ही भुजाए हैं? ‘सांप्रदायिक विभाजन गीत में नहीं, इसके इन वरिष्ठ व्याख्याकारों के दिमाग में है जो एक स्थानांतरण ट्रांस्फेरेंस की मनोरचना मेंटल मैकेनिज्म के चलते इस गीत पर आरोपित किया गया है।
आगे पढ़ें :
आइए देखें कि संविधान विशेषज्ञ ए-जी- नूरानी व कवींद्र शुक्ला ने 17 नवंबर 1998 को घोषणा की कि वंदे मातरम् के गायन को अनिवार्य बनाए जाने का आदेश है और उसे लागू भी किया जाएगा। तब नूरानी ने फ्रंट लाइन पत्रिका के जनवरी 02-15, 1999 के अंक में इसे असंवैधानिक कदम बताया। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 28 (1) एवं 3 का उल्लंन बताया। ये अनुच्छेद इस प्रकार हैं-
उन्होंने आनंदमठ में इस गीत के योग के एम-आर-ए- बेग द्वारा किए गए विलेषण अप्रैल-जून 1969, द इंडियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल साइंस, -2, पृ-120-122 को उद्धृत किया जिसके अनुसार उपन्यास में न कि इस गीत का संदर्भ मुस्लिम विरोधी है बल्कि पूरा उपन्यास ही मुस्लिम विरोधी है। सभी भावनाओं और संवेदनाओं, जरूरतों और आवश्यकताओं के प्रति आदर सच्चे भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है। मैं भारतीय राष्ट्रवाद के शिल्पियों से, चाहे वे कलकत्ता में हों या पूना में, पूछता हूँ कि क्या वे भारत के मुसलमानों से ‘वंदे मातरम् और शिवाजी उत्सव स्वीकार करने की उम्मीद करते हैं? मुसलमान हर मामले में कमजोर हो सकते हैं लेकिन अपने स्वरणिम अतीत की परंपराओं का अस्वाद लेने में कमजोर नहीं हैं। नूरानी भारतीय नागरिक के संविधान -उल्लिखित मूल कर्त्तव्य का भी ध्यान नहीं करते प्रतीत होते, जिसके अनुसार-आजादी के राष्ट्रीय संग्राम में हमें प्रेरणा देने वाले ‘महान आदशो का अनुकरण करना और उन्हें संजोना नागरिक का मूल कर्तव्य है। क्या स्वतंत्रता संग्राम में वन्दे मातरम् के आदर्श से ज्यादा प्रेरक और कुछ रहा है? इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम् के प्रति श्रद्धा रखते हैं। यह उनकी श्रद्धा का अपमान ही था जब आगरा में 10 मार्च 2004 को 54 मुसलमानों को जाति बाहर कर दिया गया और उनकी शादिया शून्य घोषित कर दी गई क्योंकि उन्होंने यह कहीं दिया था कि वन्दे मातरम् गाना गैर इस्लामी नहीं है। मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है। पायोनियर ने 20 नवम्बर, 1998 को पार्थक्य की इस मानसिकता को उजागर किया जब मुस्लिम विद्यार्थियों ने कहा कि वे वन्दे मातरम् नहीं गाएगे क्योंकि भारत माता की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करने से मुस्लिम, मुस्लिम नह रह जाता, क्योंकि यह मूर्ति पूजा है, क्योंकि यह स्वतंत्रता संघर्ष में ‘‘हिडन हिन्दुत्व लाने का टैगौर और गँधीजी का षड़यंत्र था, हमारे बच्चे स्कूल छोड देंगे लेकिन वन्दे मातरम् नहीं गाएगे, ‘‘ हम मरने को तैयार हैं, पर वन्दे मातरम् स्वीकार नह कर सकते।
शम्सुल इस्लाम ‘मिल्ली गजट में प्रकाशित अपने लेख ‘द हिस्ट्री एण्ड पॉलिटिक्स ऑफ वन्दे मातरम् में आगरा के उस मुफ्ती के समर्थन में लिख कर (देखें 1-15 मई 2004) मात्र यही सिद्ध करते हैं कि उनकी बुद्धिजीविता कठमुल्लेपन को जस्टीफाई करने मात्र के लिए है। कवि नवीनचन् सेन ने इस गीत को पढ़ने के बाद कहा कि वैसे तो यह सब अच्छा है लेकिन आधी बंगाली और आधी संस्कृत मिलाकर सब गुड़ गोबर कर दिया है। यह मुझे गोविन्द अधिकारी के जात्रा गीतों की याद दिलाता है। मजाक उड़ाना बहुत आसान है, शम्सुलजी मजाक बनाना चाहें तो किसी भी राष्ट्रगीत का बनाया जा सकता है। ब्रिटेन के राष्टर गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं? बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है? सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है? सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय? अल्जीरिया का राष्ट्रगीत क्यों गन पाउडर की आवाज को ‘हमारी लय और मशीनगन की ध्वनि को ‘हमारी रागिनी कहता है? अमेरिका के राष्ट्रगीत में भी ‘हवा में फूटते हुए बम क्यों हैं?
चीन के राष्ट्रगीत में खतरे की यह भय ग्रन्थि क्या है? किसी भी देश के राष्ट्रगीत पर ऐसी कोई भी कैसे भी टिप्पणी की जा सकती है लेकिन ये गीत सदियों से इन देशों के करोडों लोगों के प्रेररणा स्रोत हैं और बने रहेंगे।
वन्दे मातरम् गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम् गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके। बंगाल के विभाजन के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही इसके पूरा गाते थे, न कि प्रथम दो छंदों को। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इसका पूर्ण- असंक्षिप्त वर्शन गया गया था। इसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे। 1901 के कांग्रेस अधिवेशन में फिर इसे गाया गया। इस बार दक्षणरंजन सेन इसके कम्पोजर थे। इसके बाद कांग्रेस अधिवेशन वन्दे मातरम् से शुरू करने की एक प्रथा चल पडी। 7 अगस्त 1905 को बंग-भंग का विरोध करने जुटी भीड़ के बीच किसी ने कहा : वन्दे मातरम् और चमत्कार घट गया। सहस्रों कंठों ने समवेत स्वर में इसे दोहराया तो पूरा आसमान वंदे मातरम के घोष से गूंज उठा। इस तरह अचानक ही वन्दे मातरम् और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को उसका प्रयाण-गीत मिल गया। अरविन्द घोष ने इस अवसर का बडा रोमांचक चित्र खींचा है। 1906 में अंग्रेज सरकार ने वन्दे मातरम् को किसी अधिवेशन, जुलूस या सार्वजनिक स्थल पर गाने से प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रसिद्ध नेता सुरेंद्रनाथ बनर्जी और अमृत बाजार पत्रिका के सम्पादक मोतीलाल घोष ने बारीसाल में एकत्र हुए युवा कांग्रेस अधिवेशन के प्रतिनिधियों से चर्चा की। 14 अप्रैल 1906 को अंग्रेज सरकार के प्रतिबंधात्मक आदेशों की अवज्ञा करके एक पूरा जुलूस वन्दे मातरम् के बैज लगाए हुए निकाला गया और पुलिस ने भयंकर लाठी चार्ज कर वंदे मातरम के इन दीवानों पर हमला कर दिया। मोतीलाल घोष और सुरेंद्र नाथ बनर्जी जैसे लोग रक्त रजित होकर सड़को पर गिर पड़े, उनके साथ सैकड़ों लोगों ने पुलिस की लाठियाँ खाई और लाठियाँ खाते खाते वंदे मातरम् का घोष करते रहे।। अगले दिन अधिवेशन फिर वन्दे मातरम् गीत से शुरू हुआ। 6 अगस्त 1906 को अरविन्द कलकत्ता आ गए और वन्दे मातरम् के नाम से एक अंग्रेजी दैनिक ही निकालना शुरू किया। सिस्टर निवेदिता ने प्रतिबंध के बावजूद निवेदिता गर्ल्स स्कूलों में वन्दे मातरम् को दैनिक प्रार्थनाओं में शामिल किया। लेकिन नूरानी अकेले नहीं हैं जिनको देवी या माता जैसे शब्द भी सांप्रदायिक लगते हैं, 13 मार्च 2003 को कर्नाटक के प्राथमिक एवं सेकेण्डरी शिक्षा के तत्कालीन राज्य मंत्री बी-के-चंद्रशेखर ने ‘प्रकृति‘ शब्द के साथ ‘देवी लगाने को ‘‘हिन्दू एवं साम्दायिक मानकर एक सदस्य के भाषण पर आपत्ति की थी। तब उस आहत सदस्य ने पूछा था कि क्या ‘भारत माता, ‘कन्नड़ भुवनेश्वरी और ‘कन्नड़ अम्बे जैसे शब्द भी साम्दायिक और हिन्दू हैं? 1905 में गाँधीजी ने लिखा- आज लाखों लोग एक बात के लिए एकत्र होकर वन्दे मातरम् गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नह करता। 1936 में गाँधीजी ने लिखा - ‘‘ कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन विशेषणों को यथार्थ में बदलें। इसका स्रोत कुछ भी हो, कैसे भी और कभी भी इसका सृजन हुआ हो, यह बंगाल के विभाजन के दौरान हिन्दुओं और मुसलमानों की सबसे शक्तिशाली रणभेरी थी। एक बच्चे के रूप में जब मुझे आनन्दमठ के बारे में कुछ नहीं मालूम था और न इसके अमर लेखक बंकिम के बारे में, तब भी वन्दे मातरम् मेरे ह्रदय पर छा गया। जब मैंने इसे पहली बार सुना, गाया, इसने मुझे रोमांचित कर दिया। मैं इसमें शुद्धतम राष्ट्रीय भावना देखता। मुझे कभी ख्याल नह आया कि हिन्दू गीत है या सिर्फ हिन्दुओं के लिए रचा गया है। देश के बाहर 1907 में जर्मनी के स्टुटगार्ट में अंतर्राष्टीय सोशलिस्ट कांग्रेस का अधिवेशन शुरू होने का था जिसमें पं- श्यामजी वर्मा, मैडम कामा, विनायक सावरकर आदि भाग ले रहे थे। भारत की स्वतंत्रता पर संकल्प पारित करने के लिए उठ मैडम कामा ने भाषण शुरू किया, आधुनिक भारत के पहले राष्ट्रीय झण्डे को फहराकर। इस झण्डे के मध्य में देवनागरी में अंकित था वंदे मातरम्। 1906 से यह गीत भारतीयों की एकता की आवाज बन गया। मंत्र की विशेषता होती है- उसकी अखण्डता यानी इंटीग्रिटी। मंत्र अपनी संपूर्णता में ही सुनने मात्र से से भाव पैदा करता है। जब 1906 से 1911 तक यह वंदे मातरम् गीत पूरा गाया जाता था तो इस मंत्र में यह ताकत थी कि बंगाल का विभाजन ब्रितानी हुकूमत को वापस लेना पडा, लेकिन, 1947 तक जबकि इस मंत्र गीत को खण्डित करने पर तथाकथित ‘राजनीतिक सहमति बन गई तब तक भारत भी इतना कमजोर हो गया कि अपना खण्डन नहीं रोक सका यदि इस गीत मंत्र के टुकड़े पहले हुए तो उसकी परिणति देश के टुकडे होने में हुई। मदनलाल ढींगरा, फुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य बहुत से क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम कही कर फासी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को पत्र वंदे मातरम् से अभिवादन कर लिखते थे। सुभाषचं बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया और सिंगापुर रेडियो स्टेशन से इसका सारण होता था। 1938 में स्वयं नेहरूजी ने लिखा-‘ तीस साल से ज्यादा समय से यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा है। ‘ऐसे जन गीत टेलर मेड नहीं होते और न ही वे लोगों के दिमाग पर थोपे जा सकते हैं। वे स्वयं अपनी ऊँचाईया हासिल करते हैं। यह बात अलग है कि रविन्नाथ टेगौर, पं. पलुस्कर, दक्षिणरंजन सेन, दिलीप कुमार राय, पं- ओंकारनाथ ठाकुर, केशवराव भोले, विष्णुपंथ पागनिस, मास्टर कृष्णावराव, वीडी अंभाईकर, तिमिर बरन भाचार्य, हेमंत कुमार, एम एस सुब्बा लक्ष्मी, लता मंगेशकर आदि ने इसे अलग अलग रागों, काफी मिश्र खंभावती, बिलावल, बागेश्वरी, झिंझौटी, कर्नाटक शैली आदि रागों में गाकर इसे हर तरह से समृध्द किया है। बडी भीड भी इसे गा सकती है, यह मास्टर कृष्णाराव ने पुणे में पचास हजार लोगों से इस गीत को गवाया और सभी ने एक स्वर में बगैर किसी गलती के इसको गाकर इस गीत की सरलता को सिध्द किया।फिर उन्होंने पुलिसवालों के साथ इसे मार्च सांग बनाकर दिखाया। विदेशी बैण्डों पर बजाने लायक सिद्ध करने के लिए उन्होंने ब्रिटिश नेवल बैण्ड चीफ स्टेनलेबिल्स की मदद से इसका संगीत तैयार करवाया। 26 अक्टूबर 1937 को पं- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस की कार्यसमिति ने इस विषय पर एक प्रस्ताव स्वीकृत किया। इसके अनुसार ‘‘ यह गीत और इसके शब्द विशेषत: बंगाल में और सामान्यत: सारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीयय तिरोध के प्रतीक बन गए। ‘वन्दे मातरम् ये शब्द शक्ति का ऐसा पस्त्रोत बन गए जिसने हमारी जनता को प्रेरित किया और ऐसे अभिवादन हो गए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा।
गीत के प्रथम दो छंद सुकोमल भाषा में मातृभूमि और उसके उपहारों की प्रचुरता के बारे में देश में बताते हैं। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर धार्मिक या किसी अन्य दृष्टि से आपत्ति उठाई जाए। इतिहास के पन्नों पर वंदे मातरम्
Related items
पसन्द के रूप में दर्ज करें
पुस्तचिन्ह
इसे ई-मेल करें
टिप्पणियाँ (8)
![]()
भाई आपने सौ फीसदी सही, सटीक, और सत्य लिखा है. आपके खोजपरक लेखा के लिए साधुवाद. आपकी लेखनी को नमन. आज-कल के माहौल में ऐसा निर्भीक लेखा लिखना हिम्मत की बात है. आपसे ऐसे ही शोधपरक लेखो की आशा है. वन्देमातरम के ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ी साजिश और गुट सक्रीय है. जिसमे राजेन्द्र यादव जैसे कई विक्रत मानसिकता वाले लोग सक्रीय हैं, जो अपने आप को तथाकथिता बुद्धिजीवी मानते हैं. राजेन्द्र यादव और उनके तथाकथित प्रगतिशील, जनवादी जमात को देशभक्ति की हर बात अजीर्ण पैदा करती है. यही जमात अफ़ज़ल को माफी की बात करती है और हनुमानजी को आंतकवादी कहने से नहीं चूकती है. भारत के नकली सेकुलरों का यही असली चेहरा है. हर शर्म की बात है की जिन्हें मरने के बाद दफ़न होने के लिए पाँच गज जमीन चाहिए वही लोग धरती को नमन करने के लिए मना कर रहे हैं. और इसमे जबरन साम्प्रदायिकता घुसा रहे हैं.
समय मिले तो पधारें. 1 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
अगस्त 18, 2008
मत: +3
हमारे अनेक देशवासी ही नही वरन अनेकानेक नेता भी राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में अंतर तक नहीं समझते . वंदेमातरम् पर श्रद्धेय मनोज श्रीवास्तव जी ने अत्यंत शोधपूर्ण , विचारोत्तेजक एवं प्रत्येक प्रबुद्ध भारतीय के जानने योग्य विवरण दिये हैं ,उन्हें साधुवाद.ऐसी गंभीर रचनायें ही हिन्दी ब्लागिंग के महत्व को स्थापित करेंगी .
2 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
अगस्त 19, 2008
मत: +2
हमारे अनेक देशवासी ही नही वरन अनेकानेक नेता भी राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में अंतर तक नहीं समझते . वंदेमातरम् पर श्रद्धेय मनोज श्रीवास्तव जी ने अत्यंत शोधपूर्ण , विचारोत्तेजक एवं प्रत्येक प्रबुद्ध भारतीय के जानने योग्य विवरण दिये हैं ,उन्हें साधुवाद.ऐसी गंभीर रचनायें ही हिन्दी ब्लागिंग के महत्व को स्थापित करेंगी .
3 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
अगस्त 19, 2008
मत: +0
इस राष्ट्र मैं संस्कृति विरोधी, हिंदू विरोधी, राष्ट्र विरोधी को ही आधुनिक माना जाता है. एइसे मैं श्रधेय मनोज जी द्वारा लिखा गया यह विवरण बहुत हे विचोर्तेज्जक है और सभी प्रबुद्ध भारतियों द्वारा पढ़े जाने के योग्य है. मनोज जी को नमन जो उन्होंने इतना अच्छा लिखा. मैं इसका लिंक अपने सभी मित्रों को भेजने जा रहा हूँ
-रवि शंकर 4 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
अक्टूबर 04, 2008
मत: +0
MANYWAR,
ATTYAN HARSH HO RAHA HAI KI AAP EIS TARAH KI JANKARI APNE WEB SITE PAR DIYA HAI ESAKE LIKYE AAP EVEM AAPKE SABHEE SADASSYYO KO KOTI KOTI DHANYAWAD 5 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
फ़रवरी 07, 2009
मत: +1
हमारे देश में हमारी संस्कृति के विरोधी हमारे राजनेता ही है, वाकई में वन्दे मातरम गीत को सांप्रदायिक कहना शहीदों का अपमान है । इस बारे में मुझे स्वामी रामदेव जी के भारत स्वाभीमान कायर्क्रम में आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रखर वक्ता श्री राजीव दी्क्षित जी से जानकारी प्राप्त हुई थी.
आदरणीय श्री मनोज श्रीवास्तव जी को इस लेख के लिए धन्यवाद, हमारे देश को मनोज जी जैसे ही अफसर की जरूरत है ..... 6 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
मई 28, 2009
मत: +2
भाई मनोज श्रीवास्तव के इस शोधपूर्ण लेख की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। मुझे वे दिन याद हैं जब 'वंदे मातरम्' की शताब्दि मनाने की बात पर बवाल किया गया था। शासक कमजोर हों तो विवेकहीन शक्तियाँ आसानी से उसे साम्प्रदायिक बताकर उस पर सवारी गाँठती रह सकती हैं। पिछले कुछ वर्ष पहले एक अपहृत भारतीय विमान को अमृतसर से तेल देकर उड़ जाने की अनुमति दे देना भी वैसा ही कमजोर कर्म था, ऐसा मुझे लगता है।
7 अवांच्छित दर्ज करें
नापसन्द करें
पसन्द करें
मार्च 28, 2010
मत: +1 टिप्पणी लिखें
|
|





दुनिया के अधिकतर राष्ट्रगीत उस देश के संघर्ष के समय पैदा हुए हैं। चाहे फ्राँस हो या अमेरिका, उनकी उत्पत्ति संकट और संघर्ष के क्षणों में हुई है। स्वयं ब्रिटेन का राष्ट्रगीत जैकोबाइट विद्रोह के दौर की ही देन है। ये कहीं किसी राष्ट्र नायक के इर्द-गिर्द विकसित हुए डेनमार्क, हैती आदि तो कहीं देश के ध्वज के संदर्भ में होंडुरास, संयु राज्य अमेरिका, कहीं ये शुद्ध प्रार्थना है तो कहीं ये शस्त्र उठाने का आव्हान स्पेन, फ्राँस आदि, कहीं ये लोकगीत। दुनिया के हर देश को अपने राष्टर गीत पर नाज़ होता है और वहाँ के लोग उसे गाने मैं गौरव महसूस करते है। हमारे यहा राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों हैं। मगर अजीब विडंबना है कि हमारे देश में असंदिग्ध सम्मान का अधिकारी वो राष्ट्रगान भी नहीं है, जिसे गुनगुनाना भी औपनिवेशिक राजसत्ता के दौर में एक आपराधिक कृत्य था क्योंकि उसकी स्वर लहरी से साम्राज्यवादियों को नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता था। ऐसे अद्भुत राष्ट्रगान के बारे में आइए देखें कि गलतफहमी फैलाने वाले किस हद तक अपने मानसिक दिवालिएपन को उजागर करते हैं।
