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इंटरनेट के राजपथ पर हिन्दी की झाँकी Print E-mail
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विशेष |   Written by संगीता पुरी |  शुक्रवार , 01 फ़रवरी 2008

इंटरनेट पर हिन्दी जिस तेजी से अपना स्थान बना रही है उसमें सबसे बडा योगदान न तो हिन्दी के नाम पर करोड़ों रुपये बहाने वाले किसी सरकारी संस्थान या विश्व हिन्दी सम्मेलन में जाकर हिन्दी के नाम पर आँसू बहाने वाले स्वनामधन्य साहित्यकारों का है और न हिन्दी अखबारों का, यह श्रेय दिया जाना चाहिए हिन्दी के प्रति समर्पित उन व्लॉगरों को जिन्होंने अपने घर, कामकाज, दाल-रोटी और नौकरी की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बहुत कम समय में इंटरनेट पर हिन्दी को अंग्रेजी सर्च इंजिनों की मजबूरी बना दिया है। हिन्दी ब्लॉगरों की इस दुनिया को बेहद रोमांचक अंदाज में प्रस्तुत किया है संगीता पुरी ने।  
 
अनुराधा श्रीवास्तवजी के सहयोग से ब्लागर भाई.बहनों के अंतर्मन के अस्तित्व को जीवनधारा देती एक झांकी इंटरनेट के राजपथ पर देखी गयी, सुनील दोईफोड़ेजी के शून्याकार का यह कारवां पोपुलर इंडिया के दिल की आवाज को दर्शाने में समर्थ था। शास्त्री जे सी फिलिपजी इस रथ के सारथी थे। इसकी सुरक्षा के लिए चारो ओर बारमर पुलिस की तैनाती थी। जहाँ इस रथ के आगे राव गुमान सिंघजी का 'GOOD MORNING INDIA' लिखा गया वहीं दूसरी ओर पीछे महाशक्तिजी का बैनर लगा था. 'समय नष्ट करने का भ्रष्ट साधन' । दाईं ओर मीनाक्षीजी का 'प्रेम ही सत्य है' तथा बायीं ओर 'बिना लाग लपेट के जो कहा जाए ,वही सत्य है ' लिखकर सत्य को समझाने की कोशिश की गयी थी। डा महेश परिमलजी ने संवेदनाओं के पंख से इसे सजाया था। तुषार जोशीजी के शब्दचित्र इसपर खूब फब रहे।

सिर्फ नीलिमाजी ही नहीं, सभी ब्लागर भाई.बहनों के आपस के लिंकित मन को दिखाते इस रथ को सजाए जाने का भार दर्शनजी की एक आवाज पर पिरामिड सायनीरा थियेटर लिमिटेड के द्वारा अंकित माथुरजी जैसे रंगकर्मी को दिया गया था। इस रथ में रवीश कुमारजी का कस्बा बनाकर उसमें रविन्द्र रंजनजी के साथ साथ सभी ब्लागर भाई.बहनों का आशियाना बनाया गया था, जिसमें चौखट लगाने में पवनचंदनजी ने सहयोग दिया था। विवेक रस्तोगीजी का कल्पतरू बिल्कुल मध्य में सजाया गया था जिसकी महक से वातावरण सुरभित हो रहा था। इसमें एक ओर अविनाश वाचस्पति की बगीची तथा दूसरी ओर सुभाष नीरवजी की वाटिका लगाकर इसको पर्यावरणीय दृष्टि से भी उत्तम बना दिया गया था। इसमें चारो ओर जगदीश भाटियाजी का आईना लगाया गया था, ताकि दीप्ति गरजोलाजी के साथ.साथ सभी अपना प्रतिबिम्ब देख सकें। आगे अतुलजी का चौपाल और अविनाश वाचस्पतिजी का नुक्कड सजाया गया था, जिसमें छत्तीसगढ़ समाचार देते राजेश अग्रवालजी , झारखंड समाचार देते राजेश कुमारजी , मजेदार समाचार देते हुए खबरचीजी मौजूद थे । इस रथ में जहाँ एक ओर एक ओर एडमिन कवि सम्मेलन करा रहे थे तो दूसरी ओर पंकज सुबीर संवाद सेवा और तकनीकी संवाद भी चल रही थी। पीछे चंद्रिकाजी ने दखल देकर दुनिया और पी डी ने अपनी छोटी सी दुनिया बनायी थी।

एक ओर परमजीत बालीजी कठिन साधना में व्यस्त थे तो दूसरी ओर तपस्विनीजी भी। डॉ. व्योम ने लोकसाहित्य का मंच सजाया था, जिसमें अन्य पुस्तकों के साथ भुवनेश शर्माजी का हिन्दी पन्ना शामिल किया गया था तो अशोक पांडेजी का कबाड़खाना भी सजाया गया था, जिसमें  अन्य कबाड़ों के साथ दिलीप मंडलजी का रिजेक्ट माल भी लगाया गया था। शशिभूषणजी ने बिहारी , ईशानीजी ने ओडीसी, डी एन बरॅलाजी ने उत्तराखंड, प्रभाकर पांडेय ने भोजपुर नगरिया तथा अन्य लोगों ने भी अपने.अपने क्षेत्रों के मंचों का भार संभाला था। बेजीजी की कठपुतलियों का नाच गायत्रीजी की तरह भीड़ में भी तन्हा महसूस करने वालों के लिए भी मनोरंजक था। अजित वडनेकरजी के शब्दों के सफर और अरूंधतीजी की शब्दयात्रा के साथ ही साथ यह रथ आगे बढ़ता रहा। संजीव कुमार सिन्हाजी एक नागरिक के रूप में सबों को देश का हितचिंतक बनने का आह्वान करते रहें, राज भाटिया ने कहा यह कोई पराया देश नहीं, सबका अपना है।

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टिप्पणियाँ (3)add comment
शास्त्री जे सी फिलिप्: ...
गजब का लेख है!! कल ही मैं सारथी (http://www.Sarathi.info) में इसकी सूचना एवं कडी दे दूंगा -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
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फ़रवरी 01, 2008
मत: +0
meenakshi: ...
aaj avsar milne par blog jagat main utri to sab se pehle sarthi khola jisme aapke laikh ki taarif ki gayee hai. bus hum yahaan pahunch gaye. sahi main aapne badi khoobsoorti se hindi blogs ko apane laikh ki malaa main piro diya. bahut achha laga pad kar . safar main hone ke kaaran hindi main nahi likh pa rahi.
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फ़रवरी 11, 2008
मत: +0
अविनाश वाचस्‍पति: ...
अभी बेवदुनिया पर सर्च का प्रयोग करते समय इंटरनेट के राजपथ पर हिंदी लेख पर नजर पढ़ी और बतौर लेखक संगीता पुरी जी का नाम देखकर जहन में कौंध गई वो लिखचीत (चैट) जो ई मेल के माध्‍यम से संगीता जी से हुई थी। उन्‍हें अपने ब्‍लॉग्‍स के लिंक भेजते समय यह नहीं सोचा था कि वे इन्‍हें एक अमूल्‍य माला के मूल्‍यवान मोती बना देंगी। उनकी इस करनी का मैं कायल हो गया हूं। संगीता जी ऐसे ही हिन्‍दी की संगीत धुन बजाती रहिये, कानों में, मन में, मानस में हिन्‍दी रस टपकाती रहिये। बहुत बहुत शुभकामनायें इस नेक कार्य के लिए जिससे लाभान्वित होंगे अनेक. भाषा अपनी एक. माता अपनी एक. तो भिन्‍न हों क्‍यों विचार.
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अप्रेल 24, 2008
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