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| विशेष | संगीता पुरी | शुक्रवार , 01 फ़रवरी 2008 | |
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इंटरनेट पर हिन्दी जिस तेजी से अपना स्थान बना रही है उसमें सबसे बडा योगदान न तो हिन्दी के नाम पर करोड़ों रुपये बहाने वाले किसी सरकारी संस्थान या विश्व हिन्दी सम्मेलन में जाकर हिन्दी के नाम पर आँसू बहाने वाले स्वनामधन्य साहित्यकारों का है और न हिन्दी अखबारों का, यह श्रेय दिया जाना चाहिए हिन्दी के प्रति समर्पित उन व्लॉगरों को जिन्होंने अपने घर, कामकाज, दाल-रोटी और नौकरी की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बहुत कम समय में इंटरनेट पर हिन्दी को अंग्रेजी सर्च इंजिनों की मजबूरी बना दिया है। हिन्दी ब्लॉगरों की इस दुनिया को बेहद रोमांचक अंदाज में प्रस्तुत किया है संगीता पुरी ने। Related items
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टिप्पणियाँ (3)
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गजब का लेख है!! कल ही मैं सारथी (http://www.Sarathi.info) में इसकी सूचना एवं कडी दे दूंगा -- शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है 1 अवांच्छित दर्ज करें
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फ़रवरी 01, 2008
मत: +0
aaj avsar milne par blog jagat main utri to sab se pehle sarthi khola jisme aapke laikh ki taarif ki gayee hai. bus hum yahaan pahunch gaye. sahi main aapne badi khoobsoorti se hindi blogs ko apane laikh ki malaa main piro diya. bahut achha laga pad kar . safar main hone ke kaaran hindi main nahi likh pa rahi.
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फ़रवरी 11, 2008
मत: +0
अभी बेवदुनिया पर सर्च का प्रयोग करते समय इंटरनेट के राजपथ पर हिंदी लेख पर नजर पढ़ी और बतौर लेखक संगीता पुरी जी का नाम देखकर जहन में कौंध गई वो लिखचीत (चैट) जो ई मेल के माध्यम से संगीता जी से हुई थी। उन्हें अपने ब्लॉग्स के लिंक भेजते समय यह नहीं सोचा था कि वे इन्हें एक अमूल्य माला के मूल्यवान मोती बना देंगी। उनकी इस करनी का मैं कायल हो गया हूं। संगीता जी ऐसे ही हिन्दी की संगीत धुन बजाती रहिये, कानों में, मन में, मानस में हिन्दी रस टपकाती रहिये। बहुत बहुत शुभकामनायें इस नेक कार्य के लिए जिससे लाभान्वित होंगे अनेक. भाषा अपनी एक. माता अपनी एक. तो भिन्न हों क्यों विचार.
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अप्रेल 24, 2008
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