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मीडिया को नहीं दोष गुसाईं !! |
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हिन्दी मीडिया ब्लॉग | Jeet Bhargava | बुधवार , 06 अगस्त 2008 |
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लगता है हमारे तथाकथित सेकुलर टीवी और अंग्रेजी मीडिया ने हिन्दू संतों को बदनाम करने और एकतरफा रिपोर्टिंग करने की सुपारी ले ली है. इसका नवीनतम शिकार हैं संत आसाराम बापू. इसके पहले इसी मीडिया ने शंकराचार्य और योगी रामदेव को बदनाम करने तथा एकतरफा रिपोर्टिंग का महान सेकुलर कर्तव्य निभाया था. इस बात को लेकर तरस आता है कि 'सच हर कीमत पर', 'ख़बर वही जो सच दिखाए', 'आपको रखे आगे', 'सबसे तेज' जैसे झुमलों के साथ अपनी दुकानदारी चलाने वाले चैनल हिन्दू संतों के बारे में ‘कुछ भी, कैसा भी’ उगलने के लिए उतारू नज़र आते हैं. यह न कोई क्रोस चेकिंग न ही दूसरे पक्ष का बयान लेने की जहमत उठाते हैं. एक साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति भी यहाँ सोच सकता है कि संत आसाराम बापू जैसा व्यक्ति मासूम बच्चों की जान लेकर क्यो बदनामी और पाप का भागी बनेगा? इसमे उनका कौनसा हित पूरा होगा? लेकिन हमारे ये बुद्धिजीवी पत्रकार और उनके सम्पादक तथ्यों की ईमानदार प्रस्तुती की बजाय उसे अपनी मनमाफिक कहानी में ढालकर परोसने लगते हैं. और अगर किसी हिन्दू संत के मामले में ख़बर हो तो वह निरंकुश होकर चरित्र -हनन अभियान में लग जाते हैं. क्योंकि उन्हें मालूम है इस काम में किसी लश्कर या दुबई से डॉन की धमकी का खतरा नहीं है. इससे उनके ख़िलाफ़ कोई फतवा या बहिष्कार का खतरा नहीं है. ऊपर से देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और दिल्ली की मैम और सरकार भी राजी. और सोया हुआ हिन्दू समाज उनका कोई बिगाड़ नही सकता. इसी के चलते भारत भूमि में ही संत आहत हो रहे हैं. और शर्म की बात ये ही कि आहत कराने वाले लोग भी भारतीय हैं. अफ्रिका के बाद एशिया को ईसाई बनाने का एलान करने वाले पोप के गुणगान और महिमा-मंडन में हमारा मीडिया आगे रहता है. कुछ वर्ष पहले बंगलुरु में एक ईसाई गुरू ने जादू के बल पर लोगों के इलाज करने का पाखण्ड-प्रदर्शन किया था. उस वक्त भी अंग्रेजी और टीवी मीडिया उसके महिमा मंडन में लगा गया था. यहाँ तक कि उस वक्त कर्णाटक के सेकुलर कोंग्रेसी मुख्यमंत्री धरमसिंह उस महाशय के सम्मान में गए थे. इन्हे संतो द्वारा किए गए जनहित काम नज़र नहीं आते, लेकिन नीजी हित साधने वाले व्यक्ति द्वारा लगाए गए आधारहीन आरोप ज़रूर नज़र आते हैं. हम सब ने देखा कि योगी रामदेव पर आरोप लगाने वाली कम्युनिस्ट सेकुलर नेता वृंदा करात ने सेकुलर नेताओं और मीडिया की काफी तारीफे बटोरी. हिन्दू संतो, नेताओं और संगठनो की बात आते ही ये सेकुलर मीडिया अपना विष-वमन शुरू कर देता है. जिस आसाराम बापू के कहने पर हजारो लोगो ने व्यसन छोड़ दिए हो, जीवन का सही रास्ता चुना हो , जो लाखो लोगो के लिए पूज्य हो उस संत के साथ मीडिया किसी अपराधी की तरह बर्ताव कर रहा है. दूसरी ओर युवक कांग्रेस के एक नेता द्वारा रातो-रात खडा किया गया अज्ञात एनजीओ 'जागेगा गुजरात' भारत के सेकुलर मीडिया द्वारा महत्वपूर्ण हो गया? क्या उसे हिन्दू समाज विरोधी ताकतें संचालित कर रही हैं? क्या यहाँ प्रवृत्ति से उसकी विश्वसनीयता ही सवालो के घेरे में नही है? क्या भारतीय मीडिया के लिए कोई आचार संहिता है? क्या इनको नियंत्रित करने के लिए कोई नियामक संस्था है? यदि है तो वहा क्यो खामोश है? माना कि सही तथ्यों को प्रस्तुत करना पत्रकारिता का धर्म है लेकिन तथ्यों के साथ खिलवाड़ करके उसे मनोरंजन का साधन बनाना और अपने पेशे में निष्पक्षता की बजाय अपनी विचारधारा के अनुसार खबरों को जामा पहनाना कहाँ तक सही है. भारत का तथाकथित सेकुलर मीडिया धर्मान्धता और अंधविश्वासों का विरोध करते हुए भारतीय धर्म और संस्कृति पर ही हमले करने लगा है. उसकी ऐसी हरकतों से टीआरपी बढ़ सकती है लेकिन भारत का भरोसा नहीं. भारतीय टीवी मीडिया एक मदमस्त हाथी की तरह हो गया है. एक विशेष तरह की विचारधारा से पोषित और निरंकुश व मर्यादाहीन. जो मीडिया खुद को सच का साथ देने वाला, निष्पक्ष बताता है, आज वही सच को तोड़ने-मरोड़ने और पक्षपात तरीके से काम कर रहा है. अब कौन उसे आइना दिखाए, कौन उसे कटघरे में खडा करे? अपने -आप को सर्वशक्तिमान मानने वाला हमारा सेकुलर मीडिया खुद दूषित लंका पर बैठा हुआ है लेकिन हम मान बैठे हैं कि ये मीडिया है और 'मीडिया को नहीं दोष गुसाईं'Recommend this article...
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