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भारत माता की आरती की धूम विदेशों में छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मूल्यांकन: / 3
बेकारअति उत्तम 
  
जियो तो ऐसे जियो |   रमता जोगी |  मंगलवार , 04 सितम्बर 2007

हजारों लोगों की भीड़ बेसब्री से एक बड़े से मंच के पास किसी का इंतज़ार कर रही है। मंच के आसपास से शंख, ढोल और तबले की आवाज के बीच खिचड़ी दाढ़ी वाला, लंबा सा कुरता पहने एक हाथ में माईक लिए और दूसरे हाथ में ब्रश लिए एक युवक आता है और भारत माता की जय का नारा लगाकर कविता पढ़ना शुरु करता है। उसके एक हाथ में माईक है और दूसरे हाथ में ब्रश है, वह पूरी ऊर्जा से अपनी कविता पढ़ रहा है और साथ में वह पलक झपकते ही महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, शिवाजी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक जैसे वीर योध्दाओं के चित्र बनाता जाता है। कार्यक्रम का क्लाईमैक्स तब आता है जब वह युवक भारत माता का चित्र बनाता है।

 हजारों लोगों की भीड़ दम साधे उस चित्र को बनते देखते हुए कविता भी सुन रही है तभी अचानक चित्र पूरा होता है और वह युवक अपनी जोशीली आवाज में भारत माता की जय का नारा लगाता है, निस्तब्ध खड़ी भीड़ मानो नींद से जाग जाती है और पूरे वातावरण में भारत माता की जय का नारा गूँजने लगता है। थोड़ी ही देर में मौजूद हजारों लोग भारत माता के चित्र की आरती में शामिल हो जाते हैं। इस युवक से और कविता सुनाने का अनुरोध करते हुए शोरगुल मचाने लगते हैं। कई लोग तो कविता सुनकर भावुकता में इस युवक के पैर तक छूने को ललायित हो जाते हैं। यह नज़ारा इन दिनों देश के किसी छोटे से गाँव से लेकर, किसी महानगर के सबसे बड़े ऑडियोरियम और देश के बाहर कई देशो के प्रतिष्ठित मंचों पर देखा जा सकता है।

इस युवक का नाम है सत्यनारायण मौर्य और इसके फक्कड़ रहन सहन की वज़ह से प्रशंसकों ने इसे 'बाबा' नाम दिया है। मध्यप्रदेश के राजगढ़ शहर का यह युवक अपनी चित्रकला की पढ़ाई के लिए जब गाँव से पहली बार उज्जैन जैसे बड़े शहर में पहुँचा था तो वहाँ उसके पास जेब खर्च तो दूर अपनी पढ़ाई पूरी करने तक के लिए पैसे नहीं थे मगर धुन के पक्के इस युवक ने वहाँ लोगों के साईन बोर्ड, बैनर और पोस्टर लिखकर और अपने से जूनियर छात्रों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की और विक्रम विश्वविद्यालय से चित्रकला में स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। मगर आज यही युवक इस बात को गर्व से कहता है कि मैंने झूठी डिग्री हासिल करने के लिए झूठी पढ़ाई की, अगर मैं उस वक्त इस पढ़ाई का विरोध करता तो मुझे अनुत्तीर्ण कर दिया जाता। इस युवक को मैकाले की शिक्षा रास नहीं आई और लोगों को जागरुक बनाने के लिए उसने अपना खुद का माध्यम चुना-चित्रकला और कविता। आज इस फक्कड़ कवि ने दुनिया भर में अपनी पहचान बना ली है।

मगर बाबा को एक कवि के रुप में सीमित करेक नहीं देखा जा सकता, इस शख़्स को मिलने और देखने के बाद तो हम भी यह नहीं कर पाए हैं कि इसे कवि कहें, गीतकार, भजन गायक, चित्रकार या फक्कड़ मसीहा कहें, शायद यह पढ़ने के बाद आप भी तय नही कर पाएं कि बाबा आखिर है क्या चीज...

अगर आपसे कोई कहे कि अपना देश भारत महान क्यों तो शायद आप सिर खुजाने लगें या फिर बात को टालने की कोशिश करें लेकिन अमरीका यात्रा के दौरान किसीने बाबा से भी ऐसे ही यह सवाल पूछ लिया, पूछने वाले ने सोचा भी नहीं होगा कि यह सवाल वावा को ऐसा चुभेगा कि बाबा अपनी भूख-प्यास, और रोजी रोटी की चिंता किए बगैर इसका जवाब खोजने में लग जाएगा। और, बाबा ने ऐसा जवाब खोजा कि उसके जवाब को देखने के बाद हर कोई कह उठता है -हाँ, हमारा देश महान। बाबा ने रात-दिन एक कर वैदिक और उत्तर वैदिक कालीन भारत की वैज्ञानिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, खगोलीय, रसायन, भौतिकी, परमाणविक, आयुर्वेदिक, गणित, वास्तुशास्त्रीय, और विज्ञान से जुड़े तमाम उन विषयों पर शोधपरक जानकारियों को बहुत ही आकर्षक और चित्रों में इतनी खूबसूरती और कल्पनाशीलता से उतारा कि देखने वाला सुधबुध खोकर एक ही चित्र को घंटों निहारता रहता है।

बाबा की प्रदर्शनियाँ दुनिया के कई देशों में लग चुकी हैं और विदेशों में लोग महंगे टिकट खरीदकर उनकी इस कलासाधना के माध्यम से भारत के गौरवमयी अतीत को जानने व समझने जाते हैं। बाबा तो अपने बारे में कुछ बताने की बजाय या तो कंप्यूटर पर बैठकर अपना काम निपटाते हैं या फिर ब्रश लेकर किसी नए विषय पर चित्र को कैनवास पर उतारने के लिए सोच में डूब जाते हैं। हाँ, उनसे मिलने आने वालों से जरुर कई बातें पता चल जाती है। तीन साल पहले मुंबई स्वदेशी मेले में बाबा के चित्रों की प्रदर्शनी को देखकर बाबा के भक्त हो चुके और नासिक से मुंबई में बाबा से मिलने आए उनके एक प्रेमी ने बताया कि उस दिन मैं भी लोगो की भीड़ देखकर वहाँ जा पहुँचा कि माजरा क्या है। जब पता चला कि कोई प्रदर्शनी लगी है तो वापस जाने लगा कि होगी कोई सरकारी प्रदर्शनी। मगर तभी एक परिचित प्रदर्शनी देखकर बाहर निकल रहे थे, उन्होंने कहा वापस क्यों जाते हों देख लो, जिंदगी में ऐसा मौका नहीं मिलेगा। थका हारा होने के बावजूद मैं आधे मन से प्रदर्शनी देखने खड़ा हो गया। मगर प्रदर्शनी देखने के बाद ऐसा लगा कि यहाँ तो बच्चों और परिवार और मोहल्ले वालों तक को लेकर आऩा था।

आयोजन के दूसरे दिन ही प्रदर्शनी के आकार में विस्तार करना पड़ा, और बाहर बोर्ड भी लगाना पड़ा कि अंदर कोई मनोरंजन, तमाशा, खेल या डिस्कॉउंट सेल नहीं लगी है। मगर इसके बावजूद दर्शकों का हुजूम थमा ही नहीं, मेले के आखरी दिन लोग रात 11 बजे तक इस प्रदर्शनी को देखने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे। जबकि वहाँ कई बड़ी कंपिनयों के स्टॉह लगे थे मगर बीड़ थी कि बाबा की तरफ खिंची चली आ रही थी।

बाबा ने विगत कई वर्षों के अपने अथक प्रयासों से, लोगों के सहयोग से और फुटपाथ पर पड़ी पुरानी पुस्तकों से लेकर लायब्रेरियों में धूल खा रही पुस्तकों में से भारतीय अतीत के जिन सुनहरे पन्नों को अपने चित्रों के माध्यम से जीवंत किया है उसका अहसास इस प्रदर्शनी को देखकर ही किया जा सकता है।

प्रदर्शनी में बाबा के स्वयं द्वारा बनाए गए 80 से ज्यादा डिज़िटल चित्रों के माध्यम से भारत के समृध्द अतीत की जो जानकारी मिलती है उससे जहाँ हमें अपने भारत वासी होने का गौरव भी होता है वहीं इस बात पर अफसोस भी होता है कि हमारे पास सबकुछ होते हुए भी हम आज भी गुलामी की मानसिकता से उबर नहीं पा रहे हैं। इस प्रदर्शनी की सबसे खास बात यह है कि बाबा ने जो भी जानकारी इसमें प्रस्तुत की है उसके साथ प्रमाण के रुप में विदेशी वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और इतिहासकारों द्वारा दिए गए मतों का भी उल्लेख किया है।

प्रदर्शनी में बताया गया कि भारत ने आज से हजारों साल पहले धातुओं को शुध्द करने, तरह तरह के रसायन बनाने, विमान बनाने से लेकर गणित तक के क्षेत्र में एक ऐसी ऊँचाई हासिल करली थी जिसे आज का विज्ञान छू तक नहीं पाया है। चाहे न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण या गति के नियम हों, ग्रहों की खोज, उनकी पृथ्वी से दूरी, ब्रह्मांड की संरचना की गूढ़ बातें, पायथागौरस के प्रमेय का छद्म, त्रिकोणमिती व ज्यामिती से लेकर भौतिकी, गणित, भूगोल आदि विषयों पर भारतीय ऋषियों ने कितना प्रामाणिक कार्य हजारों साल पहले किया था, इन सभी विषयों को बाबा ने सप्रमाण अपनी प्रदर्शनी में दिखाया है। प्रदर्शनी में दी गई कई जानकारियों से आज के विज्ञान, कला और गणित से लेकर कंप्यूटर जैसे विषयों में पढ़ रहे छात्र तक भौंचक रह जाते।

कॉलेज के छात्र-छात्राओं से लेकर फैशनग्रस्त युवतियाँ और मुंबई के धनी मानी मारवाड़ी बाबा की कविता के दीवाने हैं। बाबा जब कविता पढ़ना शुरू करता है तो वक्त कब निकल जाता है किसी को पता नहीं चलता। आज मुंबई से लेकर दुनिया के कई देशों में बाबा अपनी फक्कड़गिरी को ज़िंदा रखे हुए कविता को एक नए रुप में पेश कर रहा है। बाबा इतिहास की घटनाओं के ऐसे दुर्लभ और मिटा दी गई सचाईयों के साथ अपनी कविता पेश करता है कि लोग दंग रह जाते हैं। बाबा के एक प्रशंसक के अनुसार इनको सुनना इतिहास की कई किताबें पढ़ लेने जैसा है। बाबा ने कविता और कवि सम्मेलन को एक नई विधा दी है और वह है संगीत के साथ कविता और चित्रकारी भी। कविता के साथ ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में जानकारी देने का उनका अपना अंदाज़ भी निराला है।


मगर मात्र कविता करना ही इस युवक की खासियत नहीं है इसकी कुछ और खासियत है जिसकी वज़ह से यह युवक आज दुनिया के कई देशों में लोगों के दिलों पर राज़ कर रहा है। अपनी मैकाले वाली पढ़ाई से नाखुश रहने वाले इस युवक को यह बात बुरी तरह सालती रहती थी कि आज से हजारों साल पहले भारत अपनी उन्नति के जिस चरम पर था वह बात सप्रमाण लोगों तक कैसे पहुँचाई जाए। इसी धुन ने इस युवक को आज दुनिया भर में लोकप्रिय बना दिया है। बाबा ने अपनी कला साधना को ड्राईंग रुम की दीवारों की शोभा बनने की बजाय इसके माध्यम से देश के गौरवशाली अतीत को चित्रों के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। यही वज़ह है कि आज बाबा द्वारा बनाए गए चित्रों को वैज्ञानिक, शोधार्थी, विज्ञान के छात्र से लेकर व्यापार और उद्योग जगत के जाने माने लोग तक होते हैं, देखने आते हैं इन चित्रों की कल्पनाशीलता और शोध को लेकर हैरत में पड़ जाते हैं। बाबा के बनाए ये सभी चित्र भारत के हजारों साल के अतीत के उस उन्नत शिखर को प्रस्तुत करते हैं जिन्हें हम भुला चुके हैं।

बाबा को उज्जैन से मुंबई लाने का श्रेय जाता है मारवाड़ियों की अग्रणी संस्था अग्रोहा विकास ट्रस्ट के मुंबई के श्री स्वरुपचंद गोयल को। स्वरुपजी बताते हैं- '1992 के सिंहस्थ में जब हम लोग अपनी प्रदर्शनी लेकर गए और हमें एक कलाकार की जरुरत पड़ी तो हमें सत्यनारायण मौर्य ने अपनी सेवाएँ दी मगर एक कलाकार की तरह नहीं बल्कि एक समर्पित सेवा भावी की तरह। बाद में मैने इसे मुंबई बुलाना चाहा मगर इसे मनाने में मुझे बहुत समझाना पड़ा। बाद में रामकथा के दौरान संयोग बना और सत्यनारायण मौर्य बाबा बनकर हम सभी का अंग बन गया। बाबा को बांधने के लिए हमने उसे ज़ी टीवी में भी नौकरी दी। वहाँ उसने जागरण कार्यक्रम को एक नई ऊँचाई प्रदान की और नौकरी छोड़ दी। मगर आज लगता है कि उसने उस वक्त सही निर्णय लिया था क्योंकि ज़ी टीवी में उसके पास बहुत सीमित काम था आज पूरी दुनिया उसकी दीवानी है। इसे बाबा नाम देने की रोचक दास्तान स्वरुपपजी खुद सुनाते हैं। घटना 1995 की है मुंबई में चौपाटी पर आयोजित विशाल कवि सम्मेलन में इइसके निराले अंदाज के लोग दीवाने हो गए और भीड़ की लगातार मांग के बीच मैंने इसे बाबा कहकर बुला लिया और तब से यह बाबा हजारों लाखों लोगों का चहेता बना हुआ है। स्वरुपजी गर्व से बताते हैं लोगों को सिंहस्थ स्नान से कई पुण्य मिलते हैं मगर मुझे यह पुण्य बाबा के रुप में मिला है, जो आज मुंबई से आगे जाकर पूरी दुनिया में अपना अलख जगा रहा है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत में अपने ही देश में लोग इस विलक्षण कलाकार की प्रतिभा को उसकी सहजता व सरलता की वजह से नहीं पहचान पाते हैं। मगर विदेशों में बसे भारतीय ही नहीं बल्कि विदेशी कलाकार और आम लोग तक इसके दीवाने हैं। बाबा के कुछ प्रशंसक उन्हें न्यूयार्क के मैनहट्टन में स्थित की योगशाला में लेकर गए जब बाबा ने वहाँ अपनी प्रतिभा का करतब दिखाया तो वहाँ मौजूद एक अमरीकी उनकी प्रतिभा से इतना प्रभावित हुआ कि उसने तत्काल अपना लैपटॉप कंप्यूटर बाबा को दे दिया। इस योगशाला की ख्याति इस वज़ह से भी है कि अमरीका के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और धनाढ्य लोग यहाँ योग सीखने आते हैं। मैडौना जैसी गायिका भी यहीं आकर ध्यान और योग सीखती हैं। बाबा ने वहाँ अपनी सहज सरल हिंदी में एक ही बात कही कि हम लोग हमारे देश में गंगा को, तुलसी को, धरती को माँ मानते हैं आप लोग भी अपने देश की नदियों मिसिसिपी, हट्सन, टैनिसी को माता मानें और उनकी पूजा करें।

त्रिनिदाद में बाबा द्वारा बनाई गई बेहतरीन व शानदार पेंटिंग प्रदर्शनी में जब आग लग गई और सभी कीमती पेंटिंग जलकर राख हो गई तो वहाँ के आयोजक इस बात की सूचना बाबा को देने में बहुत संकोच महसूस कर रहे थे, आयोजक प्रतापजी ने जब बड़े खेद के साथ बाबा को यह बात कही तो बाबा ने कहा पेंटिंग ही तो जली है मैं अभी ज़िंदा हूँ अभी तो मुझे और काम करना है। बस ऐसा ही अंदाज़े बयाँ है बाबा का जो लोगों को उनका दीवाना बना देता है। और उनके दीवाने वे लोग ज्यादा होते हैं जो बाबा की भाषा नहीं समझते वे बाबा की भावभंगिमा, चेहरे पर किसी बच्चे जैसी सहजता और अपने काम के प्रति उनकी लगन के दीवाने होते हैं। यहाँ भाषा की दीवार अपने आप ही टूट जाती है।

बाबा के कार्यक्रमों की जानकारी बाबा की वेब साईट से प्राप्त कर सकते है।

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टिप्पणियाँ (7)add comment
varadrajbapat: ...
baba सत्यनारायण मौर्य is a gr8 Deshbakh. my best wishes to him!
we need more such people for Rashtra Bhav Jagruti.
GO AHEAD BABA GO AHEAD!!!
1

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सितम्बर 05, 2007
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नीरज दीवान: ... http://neerajdiwan.wordpress.com
जानकारी देने के लिए धन्यवाद
2

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सितम्बर 05, 2007
मत: +0
anil: ...

i know baba .he is really saint. down to earth. always somthing learning and teaching. once he called me for translating some hindi caption in english.
his objective was to make me understand all his work. he said traslation can be done at some small fee , but how you will get feel of our past.
3

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सितम्बर 11, 2007
मत: +0
amit aaswani: ... http://no
send newly reports .tanks
4

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सितम्बर 22, 2007
मत: +0
Kripa Panjan Prasad: ...
Baba Morya is a blend of versatile and dynamic personality. He is master in performing persuasive speech . I am proud of him. He is a person who dedicated his life to serve not only the needy people but also our great nation. He is started his journey from Zee TV 12 yrs ago now he is taking initiative to spread the massage about real India his culture and tradition around the world.
Kripa
5

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जुलाई 11, 2009
मत: +2
मिहिरभोज: ...
मैने बाबा का कार्यक्रम कई बार देखा है हर बार एक अभूतपूर्व अनुभूति.......
6

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जनवरी 22, 2010
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2678: ...
I love Baba. I have attended several of his programs. But what surprises me till today is, why don't these programs take place in India too? And, sometimes I feel that the spirit of the participants is not in "Bharatmata vandana" during the program, but their greater focus & emphasis is on the photo-ops & marketing themselves.
7

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मार्च 07, 2010
मत: +0

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