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ब्लॉग समीक्षा |   Written by रंजना भाटिया |  गुरुवार , 28 अगस्त 2008

ik_shham_mere_naam.jpg"जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से! अपनी एक शाम उधार देंगे ना उन यादगार पलों को बाँटने के लिये "यह कहना है रांची, झारखंड के मनीषजी का, जो पिछले बारह वर्षों से सेल (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड ), सेन्टर आफ इंजीनियरिंग एवम् टेक्नॉलजी, राँची में थर्मल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में परामर्शदाता के पद पर कार्यरत हैं।

उनका कहना है कि ज़िन्दगी आज कल एक भागमभाग में बदल चुकी है, उसमें से कुछ पल चुरा कर अपने इस ब्लॉग के माध्यम से अपने साथ बिताना एक सकून देता है। उन्होंने अपने इस सुकून को अपेन तक ही नहीं सीमित रखा है बल्कि इसे अपने सबी पाठकों में बाँट रहे हैं। वे अपने ब्लॉग के जरिए आपको गीतों, गज़लों, उपन्यासों, कविताओं और सफर में बीते उन संस्मरणों के साथ जो आपको  एक दूसरी ही दुनिया मेँ खींच ले जाते हैं जिन्हें महसूस कर अपने आप को अभिव्यक्त करने की इच्छा बलवती हो जाती है ...और यदि आप इस से रूबरू होना   चाहते हैं तो एक शाम इस ब्लॉग के नाम  कर दीजिये ।"

हर ब्लॉग लिखने के पीछे कुछ न कुछ कहानी जरुर होती है और हर व्यक्ति उसी बात को लिखता है जो उसके दिल के करीब होती है। मनीष जी इस के बारे में बहुत रोचक बात बताते हैं कि जब वह दस साल के थे   तब  पहली बार उन्होंने सब से छुप-छुपाकर अपनी पुरानी कॉपी में बहनों द्वारा खाना खिलाने में मेरे साथ हो रहे तथाकथित अत्याचार का ब्यौरा लिखा था। वो कॉपी जब दीदी के हाथ लगी तो परिवार में परिहास का विषय बन गई। और मारे झेंप के लिखने का क्रम जो छूटा तो उसके बाद डॉयरी की शक्ल में तब शुरु हुआ जब मैं दसवीं कक्षा में पहुँचा। तब से ही इन्हें  अपने कॉलेज जीवन, संगीत, कविता, शायरी, किताबों और यात्रा में बीते लम्हों को डॉयरी के पन्नों में कैद करने की आदत सी हो गई। नौकरी में आने के बाद जिंदगी की प्राथमिकताएँ ऐसी बदलीं कि इस सिलसिले पर विराम सा लग गया। अपनी बात अपने जैसों में बाँट सकने की अकुलाहट दब तो गई पर मरी नहीं।
यही  वजह रही कि आज से करीब दो वर्ष पूर्व इनकी  एक मित्र ने जब इन्हे  चिठ्ठाकारी के विषय में बताया तो इन्हें  लगा कि अरे यही तो मैं  हमेशा से करना चाहता था। चिठ्ठाकारी इनके  लिए जिंदगी की इस भागदौड़ में अपनी रुचियों से जुड़ी रहने की कोशिश है। और जब अपनी इस कोशिश में दूर-दूर बैठे पर अपने जैसा सोचने और महसूस करने वाले दोस्त मिलते हैँ तो दिल को बेइंतहा खुशी मिलती है।

इन्होने अपना सबसे पहला ब्लॉग एक शाम मेरे नाम  , अप्रैल  2005 में रोमन हिंदी में शुरु किया था। इसके करीब एक साल बाद जब विन  ९८  में देवनागरी लिपि में लिखना आ गया तो अप्रैल 2006 में रोमन हिंदी के साथ साथ हिंदी में भी चिट्ठा शुरु कर दिया।

अक्सर किसी विषय पर लिखने के पहले यह देख लेते हैं  कि उस पर अब तक क्या लिखा जा चुका है। लेखन से जुड़ी सामग्री तथा  तथ्यों को यह  किताबों, पत्रिकाओं, अखबार और इंटरनेट से ले कर अपने विचारों का समावेश कर के उसको लिखते हैं।

ब्लॉग पर पुस्तकों कि  चर्चा भी बहुत अच्छे ढंग से लिखी हुई है इन्होने ..यह पूछने पर कि आज इन्टरनेट के युग में पुस्तकों से लोग कितना ख़ुद को जोड़ पाते हैं? इस पर उन्होंने बहुत ही अच्छा जवाब दिया कि ,''आज के समय में यह बड़ा प्रासंगिक प्रश्न है। आज पुस्तकों के लिए चुनौती बढ़ी जरूर है पर मेरे ख्याल से अच्छी पुस्तकें किसी भी युग में पाठकों को जोड़ सकती है। मैं इसके लिए गुनाहों का देवता का उदाहरण देना चाहता हूँ  जिसे सबसे पहले मैंने रोमन ब्लॉग पर लिखा था और बाद में हिंदी पर। रोमन चिठ्ठे की उस पोस्ट पर अनजान लोग आज भी टिप्पणियाँ करते रहते हैं और ये वो लोग होते हैं जिन्हें ये किताब आज तक झकझोरती रही है।" मेरा उद्देश्य यही है कि अपने शौक के जरिए अच्छे संगीत और साहित्य को सहज और रोचक तरीके से नई पीढ़ी तक पहुँचाने की कोशिश करूँ ताकि उनकी रुचि इस ओर जागृत हो सके।

कुछ कमी तो हर जगह होती ही है पर  हिंदी चिठ्ठाजगत में लोग विशलेष्णात्मक टिप्पणियाँ कम ही करते हैं। पर जब भी कोई इन्हे सुझाव देता है तो यह उसे सही तरह से  लिखने कि कोशिश करते हैं। इनकी  वार्षिक संगीतमालाएँ जो इन्होने २००७ में शुरू की थी उसके लिए कई सुझाव आए और उन्होंने इसको बदला। पर कोई लेख कितना अच्छा बन पड़ा है या इसमें और गुजांइश थी इसका अंदाज लेखक को स्वयम् लग जाता है और अगली बार कोशिश रहती है कि उसे और बेहतर बनाया जा सके। तो एक शाम करिए आप इस ब्लॉग के नाम और कुछ पल अपने लिए चुरा लीजिये ।

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टिप्पणियाँ (5)add comment
Abhishek Ojha: ...
मैं उन लोगों में से हूँ जो मनीष जी के ब्लॉग का एक भी पोस्ट नहीं छोड़ते... और बस यही कह सकता हूँ की बिल्कुल सही समीक्षा की है रंजना जी ने.
बस एक शाम की जगह 'हर शाम मनीष जी के नाम' हो जाय तो भी बोरियत नहीं होनी.
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अगस्त 28, 2008
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sajeev sarathie: ...
thanks ranjana ji for writing about one of my very fav blog. manish himself is a very nice person and that reflect in every article he write.
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अगस्त 29, 2008
मत: -1
अफ़लातून: ...
मनीष के उत्कृष्ट चिट्ठे की चर्चा के लिए रंजना जी का आभार । मनीष के पंजीकृत पाठक (जो उनके ब्लॉग की फीड नियमित प्राप्त करते हैं) करीब ३०० हैं और यह संख्या सर्च- इंजनों और संकलकों से आने वाले पाठकों से अलग है। ऐसा ठोस पाठक वर्ग बना कर ही ब्लॉग वैकल्पिक मीडिया बन सकते हैं ।
3

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अगस्त 29, 2008
मत: -1
रचना: ...
नमस्ते रंजना जी!! मनीष जी के ब्लॊग की उम्दा समीक्षा के लिये शुक्रिया. मै भी उनके कई सारे प्रशंसको‍ मे से एक हूं और उनके ब्लॊग की नियमित पाठक भी..उनकी शौकीया ब्लॊगिंग का प्रोफ़ेशनल तरीका काबिले तारीफ़ है! :) मेरे हिन्दी चिट्ठाजगत से परिचय और हिन्दी चिट्ठा लेखन की शुरुवात का श्रेय उन्ही को जाता है.
4

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अगस्त 29, 2008
मत: -1
रवि शंकर: ...
मैं इस ब्लॉग का नियमित पाठक हूँ विगत १ वर्ष से इसका लिंक मुजे मेरी एक मित्र ने भेजा था तबसे मैंने इसका एक भी अंक नहीं छोड़ा है. मैं इसे गानों से ज्यादा पुस्तक चर्चा एवं शायरों के वर्णन के लिए पसंद करता हूँ.
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सितम्बर 03, 2008
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