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| कविता | किरण सिन्धु | रविवार , 10 मई 2009 | |
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माँ,
यदि मेरा वश चलता तो तुम्हारे मृत्युपथगामी पगों को अपने नन्हे हाथों से रोक लेती. तुम्हारी चिता में सिर्फ तुम्हारा पार्थीव शरीर ही नहीं जला, जल गया मेरा बचपन और राख हुई तुम्हारी ममता भी. अपनी छाती से लगा कर जब तुम्हारी बाहें मुझे घेर लेती थी, मुझे एक सुदृढ़ किले का आभास होता था. वह दूध का कटोरा अभी भी याद है, जिसमे तुम्हारे हाथ अमृत घोल दिया करते थे. माँ, तुम फिर से मेरे अन्दर जी उठी, जब प्रकृति ने मुझे मातृत्व कि गरिमा प्रदान की. यदि मेरा वश चलता तो, रोक लेती उस महाकाल को, जिसने झपट कर मेरी गोद से मेरा बच्चा छीन लिया है. वह कोई उल्कापिंड नहीं था जो टूटता हुआ तारा बन जाता है, वह तो मेरे अस्तित्व का अंश था. उसकी धड्कन से मेरा हृदय धड़कता था, उसकी आँखों में मेरे सपने थे. लेकिन, मैं रोक न सकी उसे जाने से. कितनी विवश, कितनी असाहय! एक बिलखती, सिसकती जिंदगी जीने को बाध्य! मेरा बचपन जिस मातृत्व को तरसता था , वह मातृत्व अपने बच्चे के लिए विलाप करता है. जीवन की यात्रा पूरी करते-करते जीवन ही बोझ लगने लगा है पैर शक्तिहीन होकर काँपने लगे है, आँखों की ज्योति धुंधली हो चली है हर पल एक युग बन गया है. कल की साम्राज्ञी माँ आज कंगाल बन चुकी है, लेकिन फिर भी अपनी अभिशप्त साँसे जीने को विवश!
- किरण सिन्धु
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